भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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आत्मबोध

( ३३ )

कहैं कबीर तहाँ कर्मकी जाड है, जीवघोर निद्रापड़ा कहाँ जागे ॥ आपनी २ बीज अंकूर है, करै करतृति सो पाय तैसी । बोई है आम तो आम्बफल खाइहै, बोई है बबूलतो सूलबैसी ॥ पापअरु पुण्य दोउबीज अंकूर हैं, वाहिसो बीजफल हाथआवै । कहैं कबीर ये संतका शब्द है, करै करतूतसो नाहिं जावै ॥ सदगति जीवको भलीमति ऊपजे, दुर्गतीजीवकी बुरी आवै । सदगति जीव सुखसार साई भजे, दुर्गतिजीवमिलिजहरखावै ॥ सदगतिजीव सतसंगजनबन्दगी, दुर्गतिजीव विषधार पैसा । कहैं कबीर ये बीज अंकूर है, बाहि है बीज फलखाय तैसा ॥ बुराभी आपना आपही करत है, भला भी आपना आप सारै । आपही आपको पारले ऊतरे, आपही आपको बोरि मारै ॥ आपही उलझिकरि बहेविषधारमें, आपहीसुलझिहरिनामलगौ । कहैं कबीर ये भाव सब आपना, आपही सोयकरि आपजागै ॥ जीव अज्ञान सबअंध चेतै नहीं, बहे विषधारमें खाय गोता । पाप करनी करै नाम उरना धरै, पापके बीचसों फिरै रोता ॥ यार आशनासूं प्रीतिअतिकरत है, रामके जनोंकी करतहांसी । कहैं कबीर नर ऊबरे कौनविधि, मारिहैं काल गलडार फांसी ॥ मोहके वृक्षमें जीव सब मगन है, देत हैं अंड तहाँ हर्ष माने । काल अकराल तहाँ रैनदिनतकतहै, चलतहै चक्रतहैं सकलभाने ॥ राव अरुंरकसबएकनाके चले, नहिंपावअरुपलककी खबरजाने । कहैं कबीर सोइ संतजन ऊबरे, रैन दिन रामही नाम गावे ॥ मोहिके माँहि सब जीव मस्तान हैं, खान अरुपानमें मगन हुआ । नारिसूंपुरुषअरु पुरुषसूंनारिहै, अरसअरु परसमिलि नाहिंजुआ ॥ नारिके रैनदिन ध्यान है पुरुषका, पुरुषको ध्यान है नारिकेरा । कहैं कबीर यों जीवसबउलझिया, कहौ क्यों छूटि है भर्म फेरा ॥

बो० सा० ९/