कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1411, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंआत्मबोध
( ३५ )
पलटा साजका कोईनासरा, गिर्दसे कोट सब आइघेरा ॥ नहीं श्रवणसुने अरु नैनभी झरत है, चालता पाँवमें परत आटी। कहैं कबीरकोइकान मानै नहीं, जरा जब योगनी गद्दा माटी ॥ चेतरेचेत अबमूठ क्यासोरहा, सठसब अवस्था जाय बीती। आययमराज जबचहुँदिशिचेरिहै, होयगी तोहिमें बहुत फजीती ॥ देखऔसान यह फेरिपावैनहीं, सुमिरि हरिनामसबतज अनिती। कहैं कबीर संसारकुल स्वार्थी, नहीं परमार्थी छाड़ प्रीती ॥ चेतरेचेत अब अंध सोवै कहा, खोजगुरु ज्ञानमनजागमेरा। तात अरुमातसुनबन्धुयुवतीसखा, कहोकालकीचोटमेंकौनतेरा ॥ येमिलेसब स्वार्थी नाहिंपरमार्थी, तासुके बीचतैं किया डेरा। सबठगोंकावासहै झूठविश्वासहै, काटिमोहफांसीगहोनाममेरा ॥ कहैं कबीर निजनामको सुमिरिले, बहुरि नहिंहोय संसार फेरा। संतसब कहतहैं अंध चेतैनहीं, मोहके महलमें जीव सोवै ॥ देखहीरो जन्म फिरि पावै नही, काँचके राचने काह खोवै। वस्तुनहिं पाइहै बहुरिपछताइहै, सीखसुनि लेहु सतमान मेरी ॥ कहैं कबीरजबकालचपेटिहै, होय छिन एकमें खाक ढेरी। भर्माता भर्माताहाथहीरा चढा, सोकौडियामाहि नै काहि दीधौ ॥ देखहीरोजन्म फिरि पावै नहीं, बड़ीनिधि पायकैतै कहाकीधौ। विनशिहैं पलकमें आशनाहींकछु, रामभजुरामभजुकाज सीजै ॥ कहैं कबीर नरखायखोटामति, मोहके जालमें कहा छीजै। देखनिर्मौलको हाथहीरोचढ़्यो, चेतरे अंध अब कहाँ सोवै ॥ भजोभगवानअरुकरोजनबन्दगी, कौडियारुयालकणिकाहिखोवै। सुखसारहृदयधरोछारको परहरो, सुरतिसुरझाय जौ मुक्तिपावै ॥ कहैं कबीर नर चूक अवसानको, दावँको खोय करि कहाँ रोवै। खतामत खायतू चेतरे बावरे, शीस आई जरा नाम लीजै ॥