कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ
पृष्ठ 1416, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 1416
( ४० )
बोधसागर
सुरतिके थाकते निरतभी थाकिया, निरतके थाकते शेषकंपा ॥ शेषके कंपते धरनिभी धसमसी, धरनिके धसमसे मेरुडोला । मेरुके डोलता शब्दसायर मिला, उर्द्धमें शब्द घनघोर गाजा ॥ बखत बखतीमिली कर्मयारी जुरी, बांधिपाताल आकाशफेरा । सत कबीर तहां ब्रह्म चौरी रचा, सत साहब तहां लिया फेरा ॥ अथर दरियाव दरगाहकुछअजबहै, निर्मली ज्योतिजहांखूबसाई । ज्योतिके ओट यम चोट लागे नहीं, तत झँकार ब्रह्माण्डमाहीं॥ ज्ञानका बाग जहांगैवका चांदना, वेद कितेबकी गम्म नाहीं । खुल गयेचश्मजवहश्मसब पशमहै, दीनअरुदुनीका कामनाहीं ॥ कहैं कबीर यह भेद बिरलालहै, झलमलैज्योतिजहांझूलेझाई ।
इति आत्मबोध रेखता प्रथम भाग समाप्त