कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजनधर्मबोध
( ५५ )
रहै आँखि प्रचलाते बांधी । आधी बंद खुली रह आधी ॥ सोवत माहँ सुरति कछु रहई । बार बार लछु निद्रा गहई ॥
इति
अथ वेदिनी कर्म द्विविधिवर्णन--चोपाई
कर्म वेदिनी द्वे विधि हुवा । साता एक असाता दूवा ॥ साता कर्म उदय जब होई । जीव विषय सुखवेदक होई ॥ कर्म असाता उदय जो होई । जिव वेदै दुख खेदत होई ॥
इति
अथ मोहनी कर्म द्विविधि वर्णन--चोपाई
दो विधि मोहनी कर्म बखानी । यक दर्शन यक चारित हानी ॥ दर्शन मोह दुविध उच्चार । चारित मोह पचीस प्रकारा ॥ प्रथम मोह मिथ्या ती होई । जिव जब और कि और गहोई ॥ दूजे मोह मिश्रकी चाला । सत् असत् गहै समकाला ॥ तृतीय मोह समकित कहीदीनी । जिन मलीन सम कितकह कीनी ॥ दर्शन मोह त्रिविध यह भाषा । सुन पचीस अबचारितशाखा ॥ प्रथमै सोलह कहो कषाई । फिर नौविधिको लेखलखाई ॥ प्रथम कषाय क्रोध कहि दीजै । जाकी उदय क्षमा गुन छीजै ॥ द्वितीय कषाय मान परचण्डा । बिनय बिनाश करे सतखण्डा ॥ द्वितीय कषाय है माया रूपी । जाकी उदय सरलता गूपी ॥ चौथे लोभ कषाय प्रकाशा । जासु उदय संतोष बिनाशा ॥ येही चार कषाय कहीजै । अनुक्रम सूक्ष्म थूल गहीजै ॥ सो चारो चौगुना करीजै । ताते सोलह भेद भनीजै ॥ अनन्ता अनबाँधिया कषाई । तासु उदै नहिं समकित थाई ॥ जाको कहिये प्रत्याख्यान । तहां सर्व संयमकी हानी ॥ उदय अप्रत्याख्यान होई । सो पञ्चम गुन थान करखोई ॥ जोत ज्वलन नाम कहलावै । यथा ख्यात चारित विनशावै ॥