कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजनधर्मबोध
( ५१ )
कूबर सहित वक्र वपु जांको । कुबजाकार नाम है ताको ॥ लघुस्वरूप लघुजाहि निहारो । तासु नाम बावन वपु धारो ॥ जो सरवंग असुंदर भुण्डा । ताको नाम कहावै हुण्डा ॥ अष्टम प्रकृत भेद षट भाषा । अब नौमे कह अस्थिकि साखा ॥ प्रथम बखान अस्थि आरंभा । सो षट विधिसै तनको थंभा ॥ वज्र कील कीलित संधाना । ऊपर वज्र पट्ट मंडाना ॥ अन्तर हाड वज्रमय राचा । सो कह वज्र ऋषभ नाराचा ॥ दुतियों हाडजह वज्र सो होई । वज्र मेखते अविचल सोई ॥ ऊपर बैठन रूप समाना । ताहि वज्र नागच बखाना ॥ तृतिये हाड जहवज्र सो देखो । रहित वज्र पट ऊपर लेखो ॥ नहीं वज्रकी लीजो होई । नाम नराच कहावै सोई ॥ चोथे हाड जो वज्र सो नाही । अर्धबेध कीली न तेहि माही ॥ ऊपर बैठन वज्र न जाही । अर्धन राव बोलिये ताही ॥ पंच महाडन वज्रसो जिनको । नहि पटबंधन कीली तिनको ॥ कीलित तब हट्ट बंधन धारे । नाम कीलका तासु उतारे ॥ छठी अस्ति अब वर्णन करही । जो यहि काल जीव सब धरई ॥ जहाँ हाडते हाड न बंधा । अमिल परस्पर संधिन संधा ॥ ऊपर नसा जाल अरु चामा । ताको कहिये छेवट नामा ॥ दशमी प्रकृत गमन आकाशा । शुभ अशुभ दो भेद प्रकाशा ॥ शुभ उग जीवकर्म शुभ करई । अशुभके उगे कुमारग धरई ॥ जैसी प्रकृत उदय जिहि होई । तैसा कर्म करे जिव सोई ॥ कहाँ ग्यारही प्रकृत बिचारा । ताको भेद पंच परकारा ॥ श्वेत अरु दुति पीत कहीजै । हरित श्याम पांचोगति लीजै ॥ जिहि जो संगप्रकृत उगि आवै । ताको तैसा बरण बनावै ॥ प्रकृत बारहीको रसनामा । पंच मकार देखिये तामा ॥