भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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जनधर्मबोध

( ६१ )

उदय अपरजा पति जिहिपाही । पूरी देहु तासुकी नाहीं ॥ प्रकृति प्रत्येक उदय जब होई । काय बनस्पति हो जिव सोई ॥ जड़ त्वचकाठ फूल फल पाता । बीज मही तरास कह साता ॥ सातभेद तन जिव तहैं एकू । सो जिव कहिये राम प्रत्येकू ॥ दो विधि प्रत्येक बनस्पति जानो । प्रतिष्ठित अपरतिष्ठित मानो ॥ धार अनंत रास जो कायक । ताहि प्रतिष्ठित कहै सुभायक ॥ जामैं नहिनि गोदको धामा । अप्रतिष्ठित प्रत्येक सो नामा ॥ काय बनस्पति कह साधारण । सूक्ष्म बादर दुविधि विचारण ॥ संग्रह एक एकही देहा । तिहि कारण निगोद कहयेहा ॥ पिंडनिगोद है रास अनंता । पूरित नभको पावै अंता ॥ सूक्ष्म बादर दोय प्रकारा । नित्य अनित्य नाम जो धारा ॥ गोलक रूपी पाँचो धामा । अँडर खँडर इत्यादिकनामा ॥ सो सब नरक पातको जानी । तिनको दुख को सकै बखानी ॥ जीव निगोध एक तन माही । एते जिव कछु वर्ण न जाही ॥ धरे जन्म सब एकै बारी । मरण एकठे मास बिचारी ॥ एक श्वास उच्छ्वासके माहीं । तिनको जन्म भरन असआहीं ॥ जन्म अठारह बारहैं जिनको । मरब अठारह बारहि तिनको ॥ एक श्वास उच्छ्वासहि काला । तिनके जन्म मरणकोख्याला ॥ एक निगोद शरीरके माहीं । एते अमित जीव तहैं आहीं ॥ तीन कालके सिद्ध जो नाना । तिनकै एक अंश परमाना ॥ जीवगोदकी कथा अनंतो । वर्णन इत न होय बुधवंतो ॥ साधारण प्रकृति जब लहई । ताते जिव निगोदतन गहई ॥ साधारण प्रकृत लो बरना । चौदह शाखा तामैं धरना ॥ शेष और जो चौदह रहई । ऐसो ताको व्यौरा कहई ॥ थिरप्रकृत तनमें थिरताई । अथिर उदैते तन अथिराई ॥