भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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जैनधर्मबोध

( ६३ )

परगुण त्याग होय नहिं जहँवा । दान कि अंतराय कह तहँवा ॥ आतम तत्त्व लाभकी हानी । लाभ कि अंतराय सो जानी ॥ जबलो आतम योग न होई । योगको अंतराय कह सोई ॥ बार बार नहिं जगि उपयोगा । उपयोग अंतराय सो भोगा ॥ अष्ट कर्मते नहिं बिलगावै । बीरज अंतराय उगि आवै ॥ निश्चय कहीं पंच परकारा । अब सुन अंतराय व्यौहारा ॥ तुच्छ वस्तु कछु देय न सकई । दान कि अंतराय बल ठकई ॥ उद्यम किये न संपति होई । लाभ कि अंतराय कह सोई ॥ विषयभोग सामग्री जाही । जीवभोग करि सकै न ताही ॥ रोग होय कै भोग न जुरई । भोग कि अंतराय बल फुरई ॥ एक भोग सामग्री सारा । भोग ताहिको बारहि बारा ॥ कीजै सो कहिये उपभोगा । ताहूको न जुरै संयोगा ॥ यह उपभोग घात बिरुयाता । बीरज अंतराय सुन बाता ॥ जीवकी शक्ति अंत बताई । सो जग दशामें रही दवाई ॥ जगमें शक्ति कर्म आधीना । कबहुँ सबल कबहु बलहीना ॥ तन इन्द्री बल फुरै न जहँवा । बीरज अंतराय कह तहँवा ॥ ताते जक्त दशा परमाना । जैन धर्मध्वज बैन बखाना ॥ यह व्योहार प्रकृतिकह पंचो । तिहि विचार भ्रम रहै न रंचो ॥ प्रकृति विचार वर्ण यह भयऊ । जन जेष्ठ जस वानी कहेऊ ॥

इति अष्टकम्

अथ अष्ट कर्मकी आयुस्थितिवर्णन—चोपाई

ज्ञानी बर्नीकी स्थिति दीशा । कोडा कोडी सागर तीसा ॥ यह उत्कृष्ट दशा परमाना । एकमुहूर्त जघन्य बखाना ॥ दुतिय दर्शना वरनी कर्मा । थित उत्कृष्ट कहो सुन मर्मा ॥ कोडा कोडी तीस समुद्रा । एक मुहूरतकी थित छुद्रा ॥