भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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अनुरागसागर

( १७ )

लोक तीनों ताहि दीन्हो, शून्य देश वसावहू ॥ करहु रचना जाय तहैंवा, सहज वचन सुनावहू ॥१३॥ सो०-जाहु सहज तुम वेग, अस कहि आवो धर्मसो॥ दियो शून्यकर थोग, रचना रचहु बनाइके ॥ १३ ॥

निरंजनको छुटि रचनाका साज मिलानेका वृत्तान्त

सहज वचन निरंजन प्रति

आये सहज वचन सुनावा । सत्यपुरुषजसकहिसमुझावा॥

कबीर वचन धर्मराज प्रति

सुनतहि वचन धर्म हरषाना । कछुकर्हकछुविस्मय आना॥

निरंजनवचन सहज प्रति

कहे धर्म सुनु सहज पियारा । कैसे रचौं करौं विस्तारा ॥

पुरुष दयाल दीन्ह मोहिं राजू । जानु न भेद करौं किमि काजू॥

गम्य अगम मोहे नहिं आयी । करौं दया सो युक्ति बतायी॥

विन्ती करौं पुरुषसों मोरी । अहो आत बलिहारी तेरी ॥

किहि विधिरचैनवखण्ड बनाई । हे आत सो आज्ञा पाई ॥

मो कहैं देहु साज प्रभु सोई । जातैं रचना जगत्की होई ॥

सहजका लोकको जाना

तबही सहज लोक पग धारा । कीन्ह दंडवत बारम्बारा ॥

पुरुषवचन सहज प्रति

अहो सहज कस इहैंवा आई । सो हमसो तुम शब्द सुनाई॥

कबीर वचन धर्म दास प्रति

कहो सहज तब धर्मकी बाता । जो कछु धर्म कही विरुयाता॥

धर्मराज जस विन्ती लायी । तैसे सहज सुनायउ जायी ॥

पुरुषकी आज्ञा सहजसे

आज्ञा पुरुष दीन्ह तेहि वारा । सुनौ सहज तुम वचन हमारा॥