भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( ८६ )

बोधसागर

सो तन त्यागि और पुनि लेऊ । पुनि कछु काल ताहिमें रहेऊ ॥ पुनि त्याग्यौ पुनि गह्यौ नवीना । क्रम क्रम भयौ ज्ञान गुनछीना ॥ षट प्रकार गह उत्तम अंगा । पुनि पशु पक्षी कीट पतंगा ॥ नर तनमें ज्यौ पारख पावै । तौ यह जीव बहुरि घर आवै ॥ मनुज देह ज्यौ चेतन होई । तौ निश्चय जिव जाय विगोई ॥ धोखे परा जीव यहि लेखा । भांति भांतिको धारे भेषा ॥ भ्रम करि वेद कितेब बनाया । भ्रम करि द्वैताद्वैत बताया ॥ भ्रम करि कर्म धर्म ठहराया । भ्रम करि बड़ बानी कथि गाया ॥ भर्मको धर्म सकल जग माहीं । सब जिव बले भर्मकी छाहीं ॥ भ्रम करिके षट दर्शन थापा । भ्रम करिके जिव लखै न आपा ॥ भ्रम करि ईश्वर दूर बताया । विरही बने सकल जग जाया ॥ भ्रम करि इत उत दूँदन लागे । भ्रम करि प्रेम भक्तिमें पागे ॥ धोखे परा सकल संसारा । बिन सतगुरु भ्रम टरे न टारा ॥ सारशब्द सतगुरुको पावै । सब धोखा भ्रम दूरि बहावै ॥

दोहा-ब्रह्मादिक सनकादिक, भ्रम करि बानी गाय । ता बानी भ्रम विष चढ़ा, जीव गये गफिलाय ॥ तिहि कारन आसा लगी, आवा गौनको मूल । पछो ताते सात फुटि, जीव सहे बहु शूल ॥

इति

अथ सात बीज वर्णन

ॐ श्रीं रं सौं रौं ह्रीं क्लीं. अ इ उ ए व म ह ।

चोपाई

सात बीज यह कह्यौ बखानी । ताते पुनि अंकुर उत्पानी ॥ क्रम ऊपाछा योग रु ज्ञानी । उत्तपति स्थितिप्रलय विधिनाना ॥ सातो अंकुरे जब चाली । चित्तरूप तब गहौ कुदाली ॥