भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1466, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1466

( ९० )

बोधसागर

भग द्वारे हैं बालक आया । यही भांति सब जग भरमाया ॥ यहि घटमें द्वै रूप सवारी । सूरज पुरुष चंद है नारी ॥ प्रथम हतो जब सुन्न सुभाऊ । काल सुन्न एकै समुझाऊ ॥ काल भेद कोई नहि जाना । धर्मदास तुम सुनियौ ज्ञाना ॥ सुन्नहि माहैं शब्द उच्चाग । धर्मरायको भयौ पसारा ॥ प्रथमहि जिंदरूप यक भैऊ । सत्तर युग सोवत चलि गैऊ ॥ सत्य साहिब मोहि आज्ञादीन्हा । जिंद जीव कह तुम नहि चीन्हा ॥ तब हम जाय शब्द अस बोला । सोवत जिंद नाहिं चितडोला ॥ तब हम जाय जगावन लागे । जिंद न जाग प्रेम अनुरागे ॥ नाहिंन जाग नौंद भ्रम आवा । तब हम शब्द एक उपजावा ॥ काल शब्द कहि टेरि पुकारा । सुनिके जिन्द भयो संभारा ॥ काल शब्द सुनि जिंद डेराना । तब गहि आनि चरण लपटाना ॥ काल शब्द ना होता भाई । तो काहेका भक्ति कराई ॥ कालकी डर तपसी तप साधा । इंद्री पञ्च काल डर बाँधा ॥

इति

अथ उत्पत्ति कथाग्रन्थ कबीर बातो और अनुरागसागरके

अनुसार सत्यकबीर बचन--चौपाई

प्रथमें आदि समर्थते सोई । दूसर अंश हतो नहिं कोई ॥ आदि अंकुरा सुरति जो कीना । सत्य करी गभैं तब लीना ॥ पांच अंड तब भयौ उपानी । तत्त्व एक है भिन्न प्रमानी ॥ धावै अंड करै चौचन्दा । आप देखके सहजानन्दा ॥ फूटे अंड तेज भइ धारा । सबमें देख पांच ततसारा ॥ देखि रूप अंडनको भाई । सोहैं सुरति तबै उपजाई ॥ पुरुष शक्तिमें दोय प्रकारा । ताको सौंपा उत्तपतिसारा ॥ तासों उत्पत्ति भेद बतावो । बचन सुरति एकै संमावो ॥