कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंस्वसमवेदबोध
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चाले धर्म हर्ष हिय वाढ़े । मनमें करत गुनावन गाढ़े ॥ जाय कूर्मके सम्मुख भयञ्ज । नहीं प्रनाम दंडवत कियञ्ज ॥ देखे धर्म कूर्मकी काया । अठानवे कोटि योजन बतलाया बारह पालंग कूर्म शरीरा । षट पालंग धर्म बलवीरा ॥ धर्मराय तब कूर्मते कहई । मोहि पुरुषकी आज्ञा अहई ॥ सृष्टिकी रचना मोकहँ देहो । ना देहो तो मारिके लेहो ॥ तबहि कूर्म निज मनहि विचारी । यह तो काल भयो हंकारी । कहैं कूर्म सुनिये धर्मराया । पुरुष मोहि नहिं कछु फरमाया ॥ हमते मांगे कछु नहिं पावो । जाय पुरुष ढिग वेगि सिधावो ॥ यह सुनि धर्मराय अतिकोपा । कूर्मते युद्ध करण प्रण रोपा ॥ तपबल काल भयो बरियारा । अहंकार करि कूर्म प्रचारा ॥ भिरा जायके सन्मुख धाई । करे यतन किमि रचना पाई ॥ धायकाल अतिबल तिहि डाटा । तासु तीन शिर नखते काटा ॥ शीस तासु जिहि औसर खंडा । उद्भते निकसा पौन प्रचंडा ॥ रणश्रव कूर्म तन उठा पसीना । सो जलतत्त्व पृथ्वीतिहिकीना ॥ पाँचतत्त्व धरती असमाना । सूरज चंद्र नखते प्रकटाना ॥ तनत पौन छूटा जिहि बारा । रचना सकल कीन विस्तारा ॥ जबहि प्रसेव बुन्द जल दीना । महिउनचास कोटि तिहि कीना ॥ दूधपै जैसे परे ढलाई । जलपर तथा जमीन जमाई ॥ कूर्मको तिहुँ सिर भक्षण कियञ्ज । बहुरि निरंजन शून्यमें गयञ्ज ॥ धर्मराय तब कीन विचारा । कहँ लगि तीनों लोक पसारा ॥ स्वर्ग मृत्यु कीनो पाताला । बिना बीज किमि कीजै बाला ॥ करि सेवा मांगो वर सोई । जाते तिहुँ पुर मेरो होई ॥ पूर्वध्यान तब कीन निरंजन । युग चौसठ कर सेवासंजम ॥ एकपाँव पुनि सेवा कियञ्ज । चौसठ युगलों ठाढे रहेञ्ज ॥