भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( १०४ )

बोधसागर

ब्रह्मा निज मन कीन उदासा । तब चलि गये विष्णुके पास ॥ जाय विष्णुसे बिनती ठाना । तुम हो बुद्धिदेव परधाना ॥ तुमपर माता भई दयाला । हम तो आप बस भये बिहाला ॥ निज करनी फल पायों भाई । कैसे दोष लगावों माई ॥ अब सोयतन करो हो आता । चले परिवार वचन रहै माता ॥ कहैं विष्णु छोड़ो मन भंगा । मैं करि हौं सेवकाई संगा ॥ तुम जेठे हम लहुरे भाई । चित संशय सब देहु बहाई ॥ जो कोइ होवे भक्त हमारा । सो सब ही तुमरो परिवारा ॥ यज्ञ धर्म पूजा जो होई । विप्र बिना कछु होय न सोई ॥ जत्तमें ऐसो ज्ञान हटावै । पुन्यफलनकी आस लगावै ॥ जो कोइ करे द्विजनकी सेवा । हरषित हों तिहि विष्णुदेवा ॥

सोरठा-ब्रह्मा भये अनंद, जबहि विष्णु अस भाषेऊ ।

मेलो मनको द्रंद, साख मोर सुखते रहै ॥

चौपाई

ब्रह्मा भाष्यौ झूठ संदेशा । ताते ताको भयो अंदेशा ॥ विष्णु जो सांचो वचन सुनाया । माता कीन ताहिपर दाया ॥ शिव लजायके चुप है रहेऊ । झूठ सांच एको नहिं कहेऊ ॥ दृढत पिता तिहुं गे हारी । पिताको रूप न कतहुं निहारी ॥ माता कही बिहँसि निज बानी । ब्रह्मा झूठ झूठकी खानी ॥ शिव कछु झूठसांच नहिं भाखो । ताते योग ध्यान चित राखो ॥ योग समाधि करो अब जाई । जटा रखाय बिभूति रमाई ॥ माता विष्णुसे बोलै बानी । तीन लोक करिहो रजधानी ॥ शिव ब्रह्मा करिहै तब सेवा । गन गंधर्व रचिहो मुनि देवा ॥ चार बरण ब्रह्मा निरमाई । चार वेद मत चार चलाई ॥ शिवके वरण भेद ना होई । कौध रूप धरि भेष बिगोई ॥