भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1489

स्वसमवेदबोध

( ११३ )

सबलायक नायक हंसनके, जिवमोषक पोषक अंशनके ॥ सर्वोपर साहिब जीवनके, तुम जीवननाथ हो जीवनके ॥ प्रभुके भ्रमते यमते बजरे, यहि तस शिला पर आनि जरे ॥ तपिया जपिया न पिया परखे, विधि वेद लवेदन ते हरखे ॥ जिवकाज चले शिरताज सभी, महाराज मयासुख साज सभी ॥ भवभार हरो करतार धनी, भ्रमराय न पय दुखाय दुनी ॥ करि नेह बिदेह जो देह घृतं, शबदाभूत जीव भे कृतकृतं ॥ मृत नायक सायक तीख हते, पद प्रीत प्रतीत सहीत गते ॥ परमारथि भारथि नाथ सदा, गहते लहते भव पाथ हदा ॥ जनजाय समाय अमाय पदा, शुभज्ञान फुरानन सान मदा ॥ सुनि मानस हंस सुनीन्द्रमता, समता लह पाय पता रमता ॥ तब नाम सुधा वसुधा जो पिया, न खुधा युगही युग जीव जिया ॥ दुखिया हितआय महा सुखिया, लखि पीवहि जीव भये सुखिया ॥ कहँ और न दौर तो पौर परे, सरनी परनी करनी नखरे ॥ पद तीर कबीर शरीर जिते, लह सारभे ब्रह्म अकार तिते ॥ जग योनि जहान महान महा, गुरुदेवको भेव नते बलहा ॥ कमलापति क्यों कमलापति हो, पदकीरति कीरति कीरति हो ॥ मृगब्याध समाध अगाध गहे, कलपानसिरान न ध्यान लहे ॥ गुन गाय फनी गणराय निती, नहिं पावत पार अपार गती ॥ लवलीन प्रवीन नवीन जसै, कलिपंक कलंक निशंक नसै ॥ विषया बनराय भुलाय परे, दुखदौन बिनाकर कौन धरे ॥ कह कौन सँदेश अँदेश बड़ा, भग भूलि गई ठग आनि अडा ॥ शिव शोक कि झोकमें झुलि रहा, करता भरता भ्रम भूलि रहा ॥ तिहुँ लोक बिलोक लगीअगिनी, यह जामिन है यमकी भगिनी ॥ तब सूरको नूर जहूर हुआ, ममता रजनी दुख दूर हुआ ॥

बो० सा० ९