भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( १४० )

बोधसागर

साखी—जौँ वह होतो रैअत, तौ हम करते जोर । वह अलमस्त फकीर है, तहाँ न फावै मोर ॥ तुमहु कही समुझायके, पीर फकीर अल्लाह । अब तुम कहते मारने, यह न होय हमपाह ॥

चौपाई

अहो पीरजी तुम वह एका । अपने मनमें करो विवेका ॥ उन तुमरो कछु नाहिं बिगारा । काहे तुमने कुफुर पसारा ॥ बुजरूग सब नेकी फरमावै । जोर जुलुम कछु नाहीं भावै ॥

साखी—कहा हमारा मानिये, छोड़ि दीजिये रार । कुलह सुलह दे बैठिये, अल्लह ओर निहार ॥ कहै तकी सुलतान सुन, तुमे नहीं कछु दोष । जो मैं कहों सो मानिये, कर मेरो संतोष ॥ कहै सिकंदर पीर सुन, मेरो शिर बरु लेहु । फकिर कबीर न मारिये, यह मांगे मोहि देहु ॥

चौपाई

सुनतहि तकी कोध परजारा । शिरते ताज जमीन दे मारा ॥ निपटहि बिकल देखि तिहि भाई । तब हम शाहसे कहा बुझाई ॥ कहै कबीर सुनो सुलताना । करो पीरको बचन प्रमाना ॥ कहै सिकंदर सुनो हो पीरा । मन मानै सो करो कबीरा ॥

साखी—डारहु मारि कबीरको, हम नहिं मानै उन । ताका कबहु न भला हो, करे फकरको खून ॥

चौपाई

शेखतकी तब उठे रिसाई । है कोई बांध कबीरहि भाई ॥ साखी—शेखतकी आपै उठै, काजी पंडित झार । बाँध बाँध सब कोई कहै, कोई न करे गोहार ॥