भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1529, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1529

स्वसमवेदबोध

( १५३ )

पुनि निज नाम बखानिये, साहेबदास गुणग्राम ॥ उद्दैदास करु नाम पुनि, दृगमनि महामनि हंस । मुक्तामनि धर्मदासके, बिदित बयालिस वंस ॥

अथ बयालिस वंशकी स्थिति वर्णन—चौपाई

वंशबयालिसकी थिति भाखों । सत्य कबीर प्रमान जो राखों ॥ बीस द्यौस अरु वर्ष पचीसा । सिंहासन थिति येती दीसा ॥ वर्ष पचीस बीस दिन केरी । भोग पूर्ण थित हो जिहि बेरी ॥ गद्दी सौंपे जो अधिकारी । निज इच्छा पर धाम पधारी ॥ जबलों थित करार नहि पूजै । तबलों राजसिंहासन भूजै ॥ तिनको कबहुँ न मृत्युकी पीरा । अमर कीन तेहि सत्यकबीरा ॥ गद्दीको करार नियरावै । सन्त महंत खबरि तब पावै ॥ सुने सन्त पृथ्वी चहुँ खूटे । दर्शन हेत जाय तहँ जूटे ॥ लेहि चलानेको जब बीरा । जग प्रत्यक्ष निरखे तेहि तीरा ॥ यहि विधि आप लोकचलि जाई । सन्त महन्त बिदा तब पाई ॥ हंसन प्रति गद्दी थिति ऐसे । वंश बयालिस भै जे जैसे ॥ संवत पंद्रहसौ अरु बीसा । वंश थाप तेहि समयसे दीसा ॥ जब तेरही पीढी चलि आवै । मुक्तामनि तबही प्रकटावै ॥ धर्म कबीर होय परचारा । जहाँतहँ सतगुरु सुयस उजारा ॥

इति

अथ दुतिये गुरुभवसागरमें दक्षिण दिशा गोसाईं चतुर्भुजदासजी—चौपाई

लोकमें अकह अंश परकाशा । महिमें सोई चतुर्भुजदासा ॥ दक्षिणदिशि गुरु ताहि प्रसंशा । ताके हैं सत्ताइस वंशा ॥ यजुरवेद विधि पंथ चलाई । कुशहर द्रौप माहिं प्रकटाई ॥ नय करनाटक तेहि रजधानी । गह टकसार ज्ञानकी बानी ॥

इति