भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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स्वतमवेदबोध

( १५५ )

पश्चिम दिशा करें गुरुवाई । वेद अथर्वन ताने पाई ॥ शालमलय जो द्वीप कहाई । मानपुर शहरमें सो प्रकटाई ॥ कथे ज्ञान लहि बीजक बानी । सात वंश ताके परमानी ॥

इति

अथ सहतेजीके सातवंशके नाम--चौपाई

प्रथमवर्ष पारस कहवाये । दुतिये स्वातिसनेही गाये ॥ तीजे भृंगसमीप बखानी । चौथे लहरसिंधु कहि गानी ॥ पञ्चम दीपक ज्योति कहाई । पुनि जलभाष षष्ठमें जोई ॥ सप्तम मलयागिर कहि टेरा । सात वंश सहतेजी केरा ॥ निज निज वंशन युत गुरुवारी । सत्यकबीरको धर्म प्रचारी ॥ जक्त जीवको कर उपदेशा । परम धरमको कहे सँदेशा ॥ इनते इतर पंथ बहुतेरो । सत्यकबीरकी कृपा चनेरो ॥

इति

अथ सत्यकबीरके बारह पंथ वर्णन--चौपाई

बारह पंथके नाम बतावो । प्रथम नरायणदास कहावो ॥ जेठ पुत्र धर्मदासके सोई । जागू पंथ दूसरो होई ॥ तीजे सुरति गोपाल पुकारा । मूल निरंजन चौथ उचारा ॥ पंचम पंथ आहि टकसारी । छठवाँ भागू पंथ पसारी ॥ सो बीजक ले ज्ञान सुनाया । सतयेमें सतनामी आया ॥ अष्टम पंथ कमाली होई । नौमें राम कबीर कहोई ॥ दशमें प्रेम धामकी बानी । ग्यरहें जीवा पंथ बखानी ॥ बरहें एक अचारज आयौ । अपनौ नाम कबीर बतायौ ॥ बारह पंथ सुयश गुरु गैहैं । सतगुरु कृपा परमपद पैहैं ॥

इति