कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1534, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें(१५८)
बोधसागर
अथ रामकबीरजीकी कथा--चौपाई
राम कबीरकी कथा कहीजै । वैरागिनको ज्ञान गहीजै ॥ ठाकुर प्रतिमा पूजे सोई । रामकृष्णको ध्यावै ओई ॥ इत कबीर पंथिनसे मेला । उत वैरागिनमें मिलि खेला ॥ रामकृष्ण सम्बन्धी जोई । प्रीति करे पूजै सब सोई ॥
इति
अथ नानकशाहजीकी कथा--चौपाई
नानकशाह कीन तप भारी । सब विधि भये ज्ञान अधिकारी ॥ भक्ति भाव ताको लखि पाया । तापर सतगुरु कीनो दाया ॥ जिदा रूप धरयो तब साई । प्रभु पंजाब देश चलि आई ॥ अनहद बानी कियौ पुकारा । सुनिकै नानक दरश निहारा ॥ सुनिकै अमर लोककी बानी । जानि परा निज समरथ ज्ञानी ॥
नानक वचन
आवा पुरुष महागुरु ज्ञानी । अमरलोककी सुनी न बानी ॥ अर्ज सुनो प्रभु जिदा स्वामी । कहैं अमरलोक रहा निजुधामी ॥ काहु न कही अमर निजुबानी । धन्य कबीर परमगुरु ज्ञानी ॥ कोई न पावै तुमरो भेदा । खोज थके ब्रह्मा चहुँ वेदा ॥
जिन्दा वचन
जब नानक बहुतै तप कीना । निरंकार बहुते दिन चीन्हा ॥ निरंकारते पुरुष निनारा । अजर द्रौप ताकी टकसारा ॥ पुरुष बिछोह भयौ तुव जबते । काल कठिन मग रोंक्यौ तबते ॥ इत तुव सरिस भक्त नहीं होई । क्यौ परपुरुष न भेटैउ कोई ॥ जबते हमते बिछुरे भाई । साठि हजार जन्म तुम पाई ॥ धरि धरि जन्म भक्ति भलकीना । फिर काल चक्र निरंजन दीना ॥ गहु मम शब्द तो उतरो पारा । बिन सतशब्द लहै यम द्वारा ॥