भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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स्वसमवेदबोध

( १७१ )

पूरन आप निरंजन होई । यामें फेरफार नहीं कोई ॥

दोहा—पांच सहस्र अरु पांचसौ, जब कलियुग वित जाय ।

महापुरुष फरमान तब, जग तारनको आय ॥

हिन्दु तुर्क आदिक सबै, जेते जीव जहान ।

सत्य नामकी साख गहि, पावैं पद निर्वान ॥

यथा सरितगण आपही, मिलैं सिन्धुमें धाय ।

सत्य सुकृत के मध्ये तिम्भि, सबही पंथ समाय ॥

जबलगि पूरण होय नहीं, ठीकेको तिथि वार ।

कपट चातुरी तबहिलों, स्वसमवेद निरधार ॥

सबहिं नारि नर शुद्ध तब, जब टीका दिन अंत ।

कपट चातुरी छोड़िके, शरण कबीर गहंत ॥

एक अनेक न है गयो, पुनि अनेक हो एक ।

हंस चलै सतलोक सब, सत्यनामकी टेक ॥

घर घर बोध विचार हो, दुर्मति दूर बहाय ।

कलियुगमें इक है सोई, बरते सहज सुभाय ॥

कहा उग्र कह छुद्र हो, हर सबकी भवभीर ।

सो समान समदृष्टि है, समर्थ सत्य कबीर ॥

बिनय—बोपाई

बिन्ती करौ संत गुरु पाहीं । जो मम दोष न हृदय गहाहीं ॥

निज अपराध कहौ किन खोली । कहूँ कहूँ मैं बदल्यो गुरु बोली ॥

मम बानी अरु सद्गुरु बानी । दोनों यहि मत मेले सानी ॥

जहैं जस उचित देख तस कीना । सूक्ष्म गुरु वाणी गहि लीना ॥

मेरो दोष न कछु तहैं लेखब । सत्य कबीरकी बानी देखब ॥

सत्य कबीरको ग्रन्थ निहारा । सब कछु लिख्यो ताहि अनुसारा ॥

इति श्रीस्वसमवेद धर्मबोध समाप्त