भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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धर्मबोध

( १७९ )

तादिन मन पछतात बहु, करत अकेल अहार ॥ भोजनपाक निहारिके, इत उत द्वारे झांक । अभ्यागत भूखा निरखि, मारे तत्क्षण हांक ॥ विन हरिकृपा न सन्त मिल, संत मिलन सुखसार । तिनके आश्रय मुक्ति गति, सङ्कट सकल निवार ॥ गृही होय तो भक्ति कर, नातो करू वैराग । दोहु भावते एक गहु, थोथी कथनी त्याग ॥ फल कारण सेवा करे, निशि दिन याचे राम । कह कबीर सेवक नहीं, चहै चौगुना दाम ॥ सज्जन सगे कुटुम्ब हितु, जो कोई द्वारे आव । नहीं निरादर कर कोई, राखे सबको भाव ॥ रहे सदा निज गेहमें, सुमिरनमें लौलीन । ऐसे गृहीको काम कह, करवा अरु कौपीन ॥ कौड़ी कौड़ी जोरिके, कीने लक्ष करोर । कौड़ी एक न सँग चले, केतो दाम बटोर ॥ जो धन हरिके हेत नहीं, धरम राह नहीं जात । सो धन चोर लबार गह, धर छातीपर लात ॥ सतको सौदा जो करे, दम्भ छिद्र छल त्याग । अपने भागको धन लहै, परधन विषसों लाग ॥ भूखा जेहि घरते फिरे, ताको लागे पाप । गृही पाप ले जात है, पाप आपनो थाप ॥ साधु न जेवैं जाहि घर, ता घर जेवैं भूत । कलिमल ग्रसित सो जानिये, छुटै न कबहुँ छूत ॥ गृही भक्त निज धर्मरत, ताको साधु विचार । परमप्रीति जेहि साधुते, परम धर्म धन धार ॥ प्रथमहि साधु जैवाइये, पीछे भोजन भोग ।