भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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धर्मबोध

(१८१)

गृहकारजमें पाप बहु, नित लागे सुनु लोय । ताहित दान अवश्य है, दूर ताहिते होय ॥ चक्की चौका चूल्ह महँ, झाडू अरु जलथान । गृह आश्रमीको नित्य यह, पाप पंचविधि जान ॥ और युगनमहँ गृही कर, योग यज्ञ मख जाप । कलिमें सो कछु होय नहिं, कटे दानते पाप ॥ यथायोग जग लोग सब, बिन सम कीजे दान । कह राजा कह रंक है, दोनों एक समान ॥ जो धन पाय न धर्मरत, नहीं दान व्यवहार । सो शिर पावँको भारभरि, बंधे यमपुर द्वार ॥ गुरुजन जो परिवारके, कर आदर सतकार । लघु गुरुलोग जो योग जस, कुलको पालनहार ॥ पुत्र पौत्र बनितादि जे, इतर जेते लघु देख । भलो सिखावन दीजिये, जाते भला बिसेख ॥ जो गुरुजन परिवारके, लघुको सीख न देत । जो कछु औगुन सो करे, अघ शिर अपने लेत ॥ सोई मित्र सोई सगा, भल शिख शिशुहि दिखाव । तरुण अवस्था सुख लहै, गुरुजन सीख प्रभाव ॥ मारि ताड़िकै हठ किये, बाल अधर्मका राह । शुभगुण ज्ञानके पंथमें, बांधि चलाओ ताह ॥ मातु पिता सो शत्रु है, बाल पढ़ावै नाहिं । हंसनमें बकला यथा, तथा सो पण्डितमाहिं ॥ पहिले अपने धर्मको, भली भांति सिखलाय । अन्य धर्मकी सीख मुनि, भटकि बालबुधि जाय ॥ अपनो धर्म न जानेऊ, सीख्यो न्यारो धर्म ।