कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंधर्मबोध
( १८९ )
जाप एक पल नहीं छुटै, टुटै न पावै तार ॥ जब जप करते थकि गये, हरि यश गावे सन्त । कै निज धर्म पुराण पढ, ऐसो धर्म सिद्धंत ॥ मोहको जब लग त्याग नहीं, तबलग नहीं वैराग । जो मनमें वैराग नहीं, तौ समाधि नहीं लाग ॥ दुखको तजि भागे नहीं, सुख नहीं चाहत सोय । नेह क्रोध भय त्यागिये, बुद्धिकी थिरता होय ॥ आप जो खैचकै आपमें, कर्म बटोरे आप । विषयते इंद्दी खैंचिये, कटे देहको पाप ॥ इन्द्री भोग न पाव जब, मृतक सो रहि जात । तब इंद्रियन परे जो, सो आतम दर्शांत ॥ बुद्धिवन्त जे पुरुषवर, बलकरि इंद्दी साध । विषयन ध्यावन काम उग, कोह मोहकर बाध ॥ मोहते सुधि बुद्धि नाश है, सुधि बुधि बिन मृतहोय । जबै इंद्रियनको वश कियो, तबै शांति कह सोय ॥ शांतिते मन थिरता गहे, मन थिरताते योग । योग ध्यानसुध्यानते, ज्ञान गहैं सब लोग ॥ ज्ञानते आतम लाभ है, लाभ न ताहि समान । इन्द्री दम नित जाग्रन, तबही बुद्धि थिरान ॥ मनमें जो विषयन भजे, कर्म तजे का होय । सर्व मनोरथ त्यागिये, बुद्धि शांति तब होय ॥ फाका फुक्र फिक नहीं, इंद्रहि जाने रंक । सात गांठ कोपीनके, तऊ न साधुको शंक ॥ हरिकी भक्ति कबीर करु, तजि विषया रस चोज । बारबार नहीं पाइये, मनुज जन्मकी मौज ॥