कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंधर्मबोध
( १११ )
मनकामनाऽहंकार युत, सो राजस दुख भाग ॥ शुभअशुभ नहि जान जो, किये सहित अभिमान । हिंसायुत है कर्म जो, तामस ताहि बखान ॥ थोरे दिनके कर्मको, बहुत अबार लगाय । आलस्ये कारज किये, तामें तम सरसाय ॥ क्षमासमान न तप कोई, सुख नहि तोष समान । तृष्णासम नहि व्याध कोई, धर्म न दया समान ॥ व्रतके पाँचो अंग हैं, त्याग न चाहे न मोहैं । निःसंशय निस्प्रীहतां, यह पाँचो विधि जोह ॥ योगके पाँचो अंग हैं, क्षमा अष्कामं * बताय । समर्द्धि आनन्दमय, फिरि अनन्य कहलाय ॥ भक्तिके पाँचो अंग है, नामरटन धुन धार । सत्य शान्ति अरु प्रेमदृढ़, सुरति न चरनन टार ॥ भक्तिमें तीन प्रकारके प्रेम कहावे संत । रूप देह अत्यन्त जो, तीनों नाम बंदंत ॥ ज्ञानके लक्षण अब कहौं, दश प्रकारको ज्ञान । नित अक्रोध वैराग्युत, इन्द्रीदमन बखान ॥ दयापाल परमार्थी, क्षमावंत निर्धार । शोकहीन निलौंभ कहि, निर्भयं चित्तं उदार ॥ शंभ दमै विरागं विवेकं है, ज्ञानके साधन चार । सात्त्विक राजसि तामसी, निर्गुण श्रद्धा सार ॥ अंग योगके पाँच यह, संयमै मौनं यकर्न्त । विषयत्याग आतमै निरख; होय दुःखको अन्त ॥
• निष्काम ।