कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1569, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंधर्मबोध
( ११३ )
फँसाना होगा । और इसप्रकार फसे हुए पुरुषका फिर परमार्थमें लगना दुस्तर है ।
इसी प्रकारसे परमार्थको छोड़कर केवल संसारमें ही मग्न होनेसे पारलौकिक ज्ञानताके कारण अन्तमें नाना प्रकारके दुखों सहित बारम्बार गर्भकी कठिन यन्त्रणाको सहना होगा । स्वामीके कामको छोड़कर घरमें बैठनेवालेको स्वामीकी ओरसे नाना-प्रकारकी कठोरवाणी और उलाहनाके सहित लोगोंकी निन्दा उठानी पड़ती है। उसी प्रकारके पारलौकिक ( सद्गुरुकी आज्ञा ) धर्म ( परमार्थको ) छोड़कर संसारमें ही मग्न रहनेवालेकी मुक्ति और सुख छूट जावेगा और कठिन यमका दण्ड सहना पड़ेगा । प्रवृत्तिमें रहनेपर भी ज्ञानद्वारा आसक्ति शक्तिरहित निलैष रहता है वही उत्तम है, क्योंकि वह सदा परमपदपर स्थित सारासारके विचारमें संलग्न रहता है ।
प्रवृत्तिमें कुशल पुरुष निवृत्ति मार्गको सहजमें ही पूरा कर सकता है; परन्तु प्रवृत्तिमें जो कुशल नहीं है उसको परमार्थमें भी कदापि सफलता नहीं होती । शंकराचार्यादि महात्मागण जो बाल्यावस्थासे ही त्यागी थे उन्हें भी अन्तमें प्रवृत्तिके अनुभवको प्राप्त करनेका यत्न करना पड़ा ।
विशेषकर उपदेशकों और धर्म गुरुओं और आचार्य आदि गुरुकोटिके पुरुषोंको तो अवश्य उभयप्रकारसे दक्ष और अनुभवों होना चाहिये ।
इसी हेतुसे उचित है कि, शान्तिसे विचारपूर्वक धर्म और नीतिके अनुसार संसार और परमार्थ दोनोंको ही चलाना चाहिये; ऐसा न करनेसे अनन्त दुःखोंका भागी होना पड़ेगा ।
बो० सा० ९/