भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1575, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1575

धर्मवोध

( १९९ )

जो दुर्जनके साथ भाषण करे, मर्यादाको त्यागकर और आँख मूँदकर मार्ग चले वह मूर्ख है ।

पितर, गुरु, देव, माता, पिता, आता, गुरुभाई, बड़ी बहिन चाची, गुरुपत्नी, गुरुबहिन और स्वामी आदि गुरुजनोंका द्रोह करे वह मूर्ख है ।

गंभीरताको छोड़कर बोले, आदर बिना बोले, बिना पूछे बोले, निन्द्य वस्तुको अंगीकार करे, मार्ग छोड़कर चले और कुकम्भी मित्र करे वह मूर्ख है ।

दूसरेको दुखी देखकर हँसे, सुख माने और दूसरेको सुखी देखकर दुख माने, ईर्षा और वैरसे हृदयको जलावे और गई वस्तुका शोक करे वह मूर्ख है ।

अपनी प्रतिष्ठाकी रक्षा करना जाने नहीं, सदा हँसी ठट्टठा करे और हँसी ठट्टठा करके भी लड़ उठे उसे मूर्ख जानना ।

अपनेसे पूरा हो सके नहीं ऐसी शर्त करे, बिना कामके ही बड़बड़ करे, बोलनेकी रीति जाने नहीं उसे मूर्ख जानना ।

वस्त्र शस्त्र बिना ऊँचे स्थल पर जा बैठे और अपने गोत्रका विश्वास घात करे वह मूर्ख है ।

चोरको अपनी पहचान बतलाये, दृष्टि पड़ी हुई वस्तु मांगे क्रोधमें अपना अहित करे वह मूर्ख है ।

नीच लोगोंकी संगति करे, घमंडके साथ बात करे, बायें हाथसे पानी पीये वह मूर्ख है ।

समर्थके साथ मत्सरता करे, अलम्ब्य वस्तुकी आशा करे और अपनेही घरमें चोरी करे वह मूर्ख है ।

परमात्मा बिना मनुष्यपर विश्वास लावे और निरर्थक अपनी आयु नष्ट करे वह मूर्ख है ।