भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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कमालबोध

( ३ )

कटे अङ्गसों धार बहायी । आधा रक्त अरु दूध चलाई ॥ शाह सिकंदर अन्देशा माने । भेद न जाने मनमाँहि तवाने ॥ स्वामीके तन चलत दुइ धारी । हाहाकरे तब दुनिया सारी ॥

दोहा-गुरु रामानन्दहि मारिया, काशी नगर मैझार ।

शाहके वेदन बहु बढचो, त्रास भई संसार ॥

यक तो वेदनको दुखभारी । दुसरे अचरज परी अगारी ॥ कहैं सिकन्दर मन अकुलायी । ऐसा कोई औलिया नाही ॥ हमरे तनको तपन बुझावे । बहुरी अचरज को भेद बतावे ॥ सबही कहै सुनों सुलताना । इनका शिष्य यक अहे सयाना ॥ मरल गौ कह बार जियाया । बहुतक अचरजतिनदिवलाया ॥ रामानन्दहु ते अधिक बड़ाई । सत्यकबीर कहैं सब ताई ॥ तिनको दर्शन करिये शाहा । सो पुनि कहिहैं अचरजकोराहा ॥ सुनत वचन सिकंदर भाई । कीन दर्श कबीर पहुँ जाई ॥ शाह सिकंदर दर्शन आये । मिटिगयीतपनसबहुःखमिटाये ॥ जबही शाह कियो दीदारा । मिटि गयी तपनअग्निकीझारा ॥ कहे शाह तुम सच्चे साई । तुमरे दर्श तपन बुझाई ॥

दोहा-जबही तपन बुझायउ, सतगुरु दीनदयाल ।

भइ प्रतीत तब शाहको, भयो शिष्य तेहि बाल ॥

चौपाई

भयसुरीद जुलहाके आयी । तब हा-जुलकरेन-नाम धराई ॥ ज्ञान ध्यान चरचा बहु कीन्हा । शाहसिकंदर शरणजब लीन्हा ॥

१-इस शब्दके ऊपर बहुत विचार किया, किन्तु शुद्धशब्दका पता नहीं लगा जुल करन न तो फारसी या अरबी शब्द है न संस्कृत या हिन्दी । कमालबोधकी एकही प्रति मेरे पास है जो सम्मत १९११ का लिखा हुआ है । विशेषता यह है कि यह पुस्तक खास पं श्री पाक नाम साहबके समयमें उन्हींके हुजूरमें रहनेवाले एक संतकीलिखी हुई है तथापि इसमें इतनी अशुद्धियां हैं कि एक २ चौपाईको पढ़नेमें दो दो मिनट लग जाता है तथापि हजारों सन्देह सहित कापी लिखी जाती हैं ।

नं. १० बोधसागर -२