कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1597, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंकमालबोध
( ९ )
सात बेर जो जडे जँजीरा । बाहर चौकमें खड़ा फकीरा ॥
अहमदशाह वचन
अबकी लाय जमीमें गाढो । पांच २ ईंटा सब मिलि मारो ॥ जो कोई दया करे उसपर जाई । उसके घरको देहु जलाई ॥
दोहा-लाहे लागि कमालको, ऊपर ईंटा अपार ।
तन मनकी कछु सुधि नहीं, इलम फकीरी सार ॥
चौपाई
दरियाखान कचहरी जावे । आगू पड़ी भीड़ दिखलावे ॥
कहे सुबकिल सुनो दरियाई । कमालके ऊपर है कठिनाई ॥
इलम फकीरी सैल तुम पाई । मारो ईंटा फकीरके ताई ॥
जो तुम इनपर ईंटा न डारो । तब तुम सारी खिदमत हारो ॥
मारो ईंटा होयकर राजी । नहींतो तुमपर होय शाहनराजी ॥
दरियाखान वचन
कौन उपाय करें में साई । कैसे सुरशिदपर ईंट चलाई ॥
मेरी इलम फकीरी जाई । जो मैं इनपर गढ़ कर जाई ॥
तब हजरत जसपर बहुत रिसाई । तबहीं फूल एक लीन उठाई ॥
दरियाखान विवेक निधाना । भेद फूल मन करे तिवाना ॥
जो फूलै हम मरिहौ जाई । मेरो जन्म अष्ट होय जाई ॥
देखि गुनावन शाह रिसाना । कठिन बोध प्रकट दिखलाना ॥
देखि क्रोध दरिया जब लीना । पखुरी एक फूल सो छीना ॥
सोई पखुरी गुरुपै चलिया । लागत पखुरी अचेत है परिया ॥
दरियाखान दौरि ढिग गयऊ । पहर एक तक विन्ती लयऊ ॥
पहर एक मँहे चेत तब आवा । दरियाखान तब अरज सुनावा ॥
सुनहु सत गुरु विनती मोरी । इतनी ईंटा परी तुम धोरी ॥
इतनी ईंटा परी तुम संगा । तब तुम काहे न मन्यो अंगा ॥
हमतो फूलन पखुरी डारा । ताते तुम होय पड़े बेकरारा ॥