कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंश्वासगुञ्जार
( १९ )
अब तौ पुरुषप्रास नहिं मोही । गहौं बांहको राखा तोही ॥ तैं कन्या का डहकसि मोही । रचा पुरुष मम कारण तोही ॥ (तैं कामिनि कठोर निर्मोही । ) " " " " " ॥ पहिले वचन विरहते बोली । लागी कठिन कामकी गोली ॥ काम सतावै निश दिन मोही । दे पारसकी लीलहुँ तोही ॥ कामिनि कहै धर्म सुनु बाता । चढि कालिमा तोहरे गाता ॥ इठ निग्रह कामिनि किहु ताही । धर्मराय पकरी तब बाँही ॥ गही बांह कामिनिकी जबही । काम बाण घट व्यापे तबही ॥ धर्मरोष कामिनिपर कीन्हौं । गहिपगर्शासलीलतेहि लीन्हौं ॥ लीलत कामिनि शब्द उचारा । पुरुष २ करि कीन्ह पुकारा ॥ कामिनि पुरुष नामजब लीन्हौं । आज्ञा पुरुष अंशही दीन्हौं ॥ योगजीत आये तेहि वारा । सुर्त बान सो कालहि मारा ॥ पुरुष कोपि ताऊपर कीन्हा । कन्या उगलधर्मतब दीन्हौं ॥ (उगली कन्या बाहेर आई । ) " " " " " ॥ हाहाकार रोषके धावा । कामिनि पारस कहाँ चोरावा ॥ कामिनि कम्प देख विषधारा । पारस मानसरोवर डारा ॥ मानसरोवर झलतै अंगा । गयउ पताल जहाँ जलरंगा ॥ परीक्षा चार पारस परवाना । उपजी चारखान निरवाना ॥ एक परीक्षाते सरबर गयऊ । पारसके सम पारस ठयऊ ॥ दूजो अंश भयो निरवाना । शिला सिंध पर्वत परमाना ॥ रतन शिला ताहिकी धारा । सो पाजी वारे संचारा ॥ तीसर अंश नार प्रगटयऊ । अंशहि अंश चत्रगुन भयऊ ॥ चौथा अंश कामिनिअनुमाना । जाते स्वर्ग नर्क परवाना ॥ अंशहि अंश अंशते मानी । एक प्रती चौगुना उत्पानी ॥ चार २ गुण गुणहि समाना । अंशते अंश चत्र परवाना ॥