कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंश्वसगुञ्जार
( २१ )
मोह महाञ्जर बरषे लागी । मन समाध कामिनि सों लागी॥ गर्भ किये मा करदी राजा । कामिनि सोह दुहु दिशवाजा ॥ मनसालहर उद मद मन भएउ । काम दहन धन आहुत दयेऊ ॥ उपजा मदन मोह औगाहा । पुत्री पितासों भयउ विवाहा ॥
साखी-बहनीसे बेटी भई, बेटीसों भइ नार ।
नारीसों माता भई, मनसा लहर पसार ॥
चौपाई
बरबस धर्मराय हरलीन्हा । बिन लेखा रजधानी कीन्हा ॥ विषया वेद व्याह जमनाता । चौदह काल संघ उतपाता ॥ चौदह पारस लोक निसानी । शब्द व्याह चौदह यमहानी ॥ मनसा व्याह देव तिषगंधी । हंसना हंस भगत युगबंधी ॥ सुतें हंस घट रचो विदानी । धर्म समाध वसाए आनी ॥ उपजा मदन मोह औगाहा । कन्या पिताहितबभयाविवाहा ॥
(कन्या व्याकुल भई तेहि माहा ।) " " " "
धर्मराजको उपज्यो भावा । कामिनि हृदय हाथ बतलावा ॥ उपजी रंग रोषकी खानी । कामिनि चरण गहो तब जानी ॥ मनसा लहरि ताहि तेह दीन्हा । उपजी तीन लोककर चीन्हा ॥ कामिनि संग करे मुख भारी । उपजा तीनि लोक अधिकारी ॥ तीनहि शक्ति पुरुष संघ दीन्हा । तीनों सुत उपजावे लीन्हा ॥
(पांच तत्त्व तीन गुण चीन्हा ।) " " " "
तीनउ सुत उपजे बहुरंगा । पारस रहा धर्मके संगा ॥
( पारस रहा ताके संगा ।) " " " "
तीनहुँ सुत उपजे अधिकाा । धर्मराय तब भया निरारा ॥
तीनों सुत कहँ दीन्ही भारा । धर्मराय ऊंच भये निरारा ॥
राजपाट कामिनि कहँ दीन्हा । आपन बास शून्यमहँ लीन्हा ॥