कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंशवासुखार
( २३ )
खोजि थाकि माता पई आए । काहु साँच काहु झूठ सुनाए ॥ ब्रह्महि भाषा झूठ संदेशा । सकुचि वचननहिं कहेवोमहेशा ॥ भाषा विष्णु सत्यकी रेखा । खोजि थाकि पिता नहिं देखा ॥ माता बिहँसि कही तब बानी । ब्रह्मा झूठ झूठ तौ खानी ॥ शिव लजाय शिर नीचे राखा । साँच झूठ एको नहिं भाषा ॥ ताते करहु योग तप जाई । जटा बढाय विश्रुति रमाई ॥ ( तुम सुत करो योग तप जाई । शीश जटा तन भवम चढाई ) ॥ लेहु आमण्डल भेषसो कीन्हौ । शिवको थापि भवनी दीन्हा ॥
साखी—जप तप योग समै हठ, आगे ध्यान पसार ।
माना कह्यो क्रोध करि, चतुरमुख अन्ध अहार ॥
मातहि कीन्ह विष्णु पर दाय। मुखहि चूमके कण्ठ लगाया ॥ सत्य वचन सुत बोलेउ बानी । तीनहु लोक करहु रजधानी ॥ शिव ब्रह्मा करिहैं तोर सेवा । गण गन्धर्व ऋषि मुनि देवा ॥ ब्रह्मा मोसों झूठ लगावा । तेहि कारण विधि झूठ कहावा ॥ ब्रह्मा वेद पढ़े बहु भांति । कुकरम कर दिवस औ राती ॥ ( विद्या वेद पढ़े बहु भांती । कुकरम करे दिवस औ राती ) ॥ एहि अवगुण गायत्री गार्ई । ब्रह्मा दोष शाप तिन पाई ॥ मृत्यु लोक गो धरे शरीरा । अघ भुगते चौरासी थीरा ॥ गोय होय नारी कल्यारी । अघनिचोए होए पातक भारी ॥ जहाँ लग पुहुप खान परकाशा । निरधिन ठारे तुम्हारो बासा ॥ झूठी बात वेद में निर्माई । च्यार वर्णमें बड़ी बड़ाई ॥ पहिले चारों वरन पुजावै । दक्षिणा कारण गरा कटावै ॥ गरा कटाए करावे पूजा । गायलै सभे ब्रह्मा नहीं दूजा ॥ लए मूँड पडिवो रमाई । ब्राह्मण भए सो काल कसाई ॥