कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंश्वसगुञ्जार
( ३१ )
बाँटिके दाम दोउ घर दीन्हों । अमृतविष विश्वासकर कीन्हों॥ रचि खानी बहु रंग अपारा । देह माहिं बहु देह सुधारा ॥ (रची देह बहु रंग अपारा । विष अमृत बहु रंग अपारा) ॥ अग्र देह एक देह मैझारा । बाहर भीतर मध्य दुआरा ॥ (अष्ट देह यदि देह मैझारा । बाहर भीतर मध्य अखारा) ॥ चारि विमल हैं चारि तरंगा । चारि सुरंग एक बहु रंगा ॥ (चारि विमल हैं फटिक तरंगा । चारि सुरंग श्याम बहुरंगा) ॥ दुइ उज्वल हैं बाहर वासा । दुइ उज्वल जलमध्य प्रकाशा॥ (दुइ उज्वल दल मध्य प्रकाशा । श्याम सुरंग अधर दुइवासा) ॥ श्वासा सुरंग अधर दुइवासा । जरद नील घर माहिं निवासा ॥ बाहर दुइ सफेद बहुरंगा । रूप अनन्त सत शक्ती संगा ॥ पार बसै सत्त्व सुकृतको डेरा । मध्यमें विषम सरोवर घेरा ॥ निस्तत्त्वकमलसुकृतसंयवासा । विषम सरोवर काल निवासा ॥ पुहुपदीप साहेबको वासा । सुखसागर ज्ञानी रहि वासा ॥ ताके और काल उच्छवासा । मान सरोवर काम निवासा ॥ ताके और कालकी आसा । विषम सरोवर काम निवासा ॥ सबके डरे निरंजन वासा । धरम दास तुम लखो तमाशा ॥ धर्मराह सुख पौन उड़ाई । विषकी लहरि ध्वजा फहराई ॥ ज्ञानीके सुख ज्ञान प्रकाशा । अमरसार सुधा रहि वासा ॥ गुप्त झांझरी पुरुष बनाई । अक्षे अमान ध्वजा फहराई ॥ प्रकट झांझरी काल प्रकाशा । तेजपूज विविधि रहिवासा ॥ जो रचना बाहरकी भाषा । सो रचना भीतर रचि राखा ॥ जो भीतर सो बाहर दरशै । तत्त्वहि तत्त्व तत्त्वतहँ दरशै ॥ तत्त्वकि रथचढ़ि बाहर आई । अमीकी रथ तहाँ परशै धाई ॥ क्षण बाहेर क्षण भीतर आवै । सतगुरुमिलै औ सहज बुझावै ॥ ( निरखि परखि जब हेरे जाई । )