कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंश्वसगुआर
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साइ विष लेय तीर्थको आवै । चंद्र कमल पर जाय समावै ॥ एहिविधि चंद्रपक्ष चलि जाई । पाछै जीव सूर्य घर जाई ॥ पूनिमा बीते परिवा आवै । तब रथ चढिके सूर्य सिधवै ॥ सुरंग तुरै पर होय असवारा । योजन तीनि जाय चढिपारा ॥ सुखसागरमें पैठि नहाई । परसै योग सँताय न पाई ॥ अमृत मानसरोवर माहां । कामिनि दूरि धरै बोले ताहां ॥ सो अमान सुखसागर माहां । सूर्यके संग पीवे जिव ताहां ॥ पिये अमी जिव सूर्यके संग । मिटै तपत होय शीतलअंगा ॥ पल भीतर पल बाहर आवै । पीवै अमी रस तेज समावै ॥ जबही सूर्य अमीरस पावै । चंद्रहि पकरि आपुघर लावै ॥ जब चंदा आवै रवि द्वारा । होइ संक्रमण तेज अपारा ॥ तेज किरण पूरण जब होई । दरशाहि काल तपै रवि सोई ॥ तपै तेज बारहको धावै । सुखसागरमें पड़ि नहावै ॥ सुखसागरमें कर अस्नाना । उदितकमलहोइ द्वादश भाना ॥ सूर्यपर चंद होय जब जोरा । तब घर काल करै घनचोरा ॥ चन्द्र सूर्य कह राहु जो फाँसे । पल चन्दा पल सूर्यहि आसे ॥ इहि विधि देह डुइनको बाजी । पूनम धरिहि अमावससाजी ॥ चन्द्र सूर्य लै जाय अकाशा । सुखमुनिके घरदोजकर फाँसा ॥ मुसकि तुरौपर होइ असवारा । घरे शशि सूर्य अकाशके द्वारा ॥ जंबूद्वीप काल अस्थाना । सहज शून्य कह करै पयाना ॥ सहज शून्यमहैं पहुँचे जाई । सहज रहावै संग लगाई ॥ योजन डेठ सहजकर बासा । तहवाँ करै काल रहवासा ॥ सहज कालसों अंतर नाही । जीवहि छलै सहजकी बाही ॥ पलमें जंबूद्वीपहि आवै । पलमहैं सहज शून्यकहैं धावै ॥ एहिविधि चंद्र सूर्य दोह कांसै । काल सहज होय जीव गरासै ॥