भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

पुडुपबास तिल राखै छाई । तबके बासना बाहर जाई ॥ पुडुपके भीतर बास रहाई । सोई बास बाहर महकाई ॥ बाहरते भीतर लै आवै । ताके भीतर आनि समावै ॥ ताते वासन बाहर जाई । तिलके भीतर है ठहराई ॥ तिलते वासन बाहर आवै । बाहरते जो भीतर समावै ॥ भीतर वेधि एक जब होई । बास तेलमो रहै समोई ॥ समय-तौ लगि वास बहुत विधि, ज्यों लगि परैना तेल । तेल लाज छाड़िके डारै, दुइ मिलि होय फुलेल ॥

चौपाई

बास तेल मई रहे समाई । तेल काड़ि नहिं बाहर जाई ॥ तेलके संग बास महकाई । बासके संग तेल रहु छाई ॥ समय-लहा बास जहाँ तेल रहु जहाँ तेल तहाँ बास । एकै संग दूनों बसौ, महकै वास सुवास ॥

चौपाई

इहि विधि रहै दोऊ इक ठाऊँ । एकै बासना एक सुभाऊ ॥ बाहर कहि जब अंग लगावै । दुहे प्रतिमाको रूप दिखावै ॥ सुरति फूल मन तिलकी खानी । नाम बास जीव तेल बसानी ॥ बाहर फूल भीतर फुलवारी । रवि शशि करै दोय रखवारी ॥ तिल फूले विखियाकी खानी । दिनफूले निशि गिरतनजानी ॥ ऐसो फूल कुत्रिम उपराजा । तत्त्व तैल सबमध्य विराजा ॥ सोई तत्त्व मो अन्न सनेहा । तत्त्वहि तत्त्व मिलै तिल देहा ॥ तिल औ फूल एक सम कियऊ । तेहि पाछै पुनि प्राण बसियऊ ॥ दुख दीयते निकसेउ तेल । फुल देह तजि भयऊ फुलेला ॥ यहि विधि गुरु शिष्य जो होई । मुक्ति पंथ पावै पुनि सोई ॥ धर्मदास यह अद्भुत बानी । कही विचारि सुकृत सहिदानी ॥