भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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शवासुञ्जार्

( ४१ )

नख शिख खचोप उपराजा । श्वासा सहज अर्थ धुनिगाजा ॥ दुह सूर्य एक सहज घर शुन्या । तिहिं घर कर्म पापनहिं पुन्या ॥ दुई घर इंगला पिंगलाभारी । चांद सूर्य संग जीव संचारी ॥ ताकी श्वासा शक्ति सुधारी । अमृत प्रसन्नसहज सुख भारी ॥ पाँच तत्त्व रथ साजी थारा । तापर चंद्र सूर्य असवारा ॥ ताके संग जीव उठि धावै । मन तरंग रूप उपजावै ॥ सुरंग तुरै पर होय असवारा । सूर्य स्नेह जाए चढ़ि पारा ॥ विषम सरोवर पहुँचे जाई । विष धारामें पैठि नहाई ॥ करि असनान ध्यान लौ लावै । धर्मराय कह माथ नवावै ॥ परसै राय निरंजन देवा । पल मल करै ज्योतिकर सेवा ॥ चरण परसि भरमत घर आवै । रविजीवहि विष आनि पिवावै ॥ रवि रथ रहै चन्द्र उठि धावै । तुरै लीला सरवर पहुँचावै ॥ जीवसहित शशि पहुँच्यो जाई । मान सरोवर पढ़ि नहाई ॥ करि असनान देवपग परशै । कामिनि देह कमलमहँ दरशै ॥ लेके वास चन्द्र घर आवै । घर आवत यम ग्रहण लगावै ॥ पल पल कमल कमल महनावै । अंडज खानि दर्श नहिं पावै ॥ परसै चरण सरोवर दोई । आवत जात न लागे कोई ॥ श्वासा नेह देह व्यवहारा । एक लाख औ सात हजार ॥ एतिक श्वासा अंडज खानी । करै कुलाहल बोले बानी ॥ तत्त्व चले जोजन एक दोई । झाझरि पाटन बसे बिलोई ॥ खाज अखाज विचारै नाहीं । भर्मत फिरै सदा भव माहीं ॥ पल धरती पल फिरै अकासा । जल थल महिँहफिरै उदासा ॥ कायाके बहु रूप सवारी । नानारंग वरन विष धारी ॥ चञ्चल कुटिल कला मनधरहीं । नाना बानि शब्द उच्चरहीं ॥ करै कल्पना जगमँह भारी । नाचै गावै करै खुमारी ॥