भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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शवासुगुप्कार

( ४९ )

नख शिख अंग एक अनुहारी । देह स्वभाव वचन दुह मारी ॥ शक्ति देह विरह अधिकारी । शिव आशिष शक्तिको चारी ॥ इहि विधि रचना रची बिलोई । गर्भ सनेह संपूरन सोई ॥ नखशिख रचा गर्भ अस्थाना । सात द्रौप नौखण्ड वखाना ॥ एक द्रौपमें सातों दीपा । सात सुकृत तेहिमाय समीपा ॥ प्रथमै गर्भ द्रौप उपजावा । ता ऊपर रचना बिलमावा ॥ एकद्रौप नौखण्ड बनावा । त्रिकुटी सात तहाँ निरमावा ॥ एक द्रौपमें सातों नाला । सातों कमल अधर दुहमाला ॥ सरवर सात कमल तहाँ साता । रंग पांच पांचौ उतपाता ॥ पांचके मध्यहि पांच रसीला । त्रिकुटीमध्य एकतहाँ कीला ॥ ता कीलामहँ कानी लागी । पौन सनेह आतमा जागी ॥ ता कीलामहँ लागी होरी । खूटा गाडि पवन झकझोरी ॥ ता खूटा महँ डोरि लगाई । मन पवना गहि राखु झुलाई ॥ झुलि मन पवन झुलावे चेरी । इक घर शून्य एक घर फेरी ॥ खूटा होय पवन झकझोरे । इंगला पिंगला सुषुमण जोरे ॥ रवि शशि मनपौना गहि जोरी । खूट न लागि सबनकी डोरी ॥ मेरे दंडपर खूटा गाडा । नदी तीन ता ऊपर बाडा ॥ खूटाकी बाई दिशि है गंगा । विमल शीतल बहे नीर तरंग्गा ॥ चन्द्र सनेही जिव जल परशै । सुरति स्वरूप धनी दिल दरशै ॥ तासु खूटाके दहिने अंगा । यमुना नदी बहै बहुरंग्गा ॥ कीर्ति नीर और पीत तुरंगा । लहर लाल तेज विष संग्गा ॥ तहाँ बसै सुर जीवके साथ । खल एक बयालिस हाथा ॥ कला अनंत रूप रस नाथा । सबै अर्थ नहि दीसै माथा ॥ बाढि नदी जो दोउ करारा । शीतल तेज बहै दोउ धारा ॥ तिसरी नदी है गुप्त प्रवाहा । नाजल थाह न होय अथाहा ॥

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