कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंश्वसगुआर
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बुद्धी युगकी बुद्धी अपारा । तायुग महाकाल बरियारा ॥ ज्ञान गयँद होइ असवारा । बुद्धि युगमान फोरे महिभारा ॥ बुधिकबधिक बाँधिकरे कमाई । विषे चतुराई कुमति समाई ॥ एही विधि बुधि युगचलि जाई । तेहि पीछे मन बरतैं आई ॥ मन मतंग महामद माता । तेज तपस्या व्यापै गाता ॥ मनयुग ऊंच नीच सतलीला । बरपै झारी विषैको शीला ॥ मन युगकी श्वासा बहुरंगी । ज्यों जलमध्ये उठै तरंगी ॥ मन युगराज बीतिगा जबही । अहंकार युग उपजा तबही ॥ अहंकार युग अनंत समाना । मरै पतंग हार नहीं माना ॥ हारे नहीं आपु अहंकारा । गरजै छुन्छ हारे सुख भारा ॥ अहंकार युग श्वासा ऊनी । गरचि घुमडिबरपै फिरि सूनी ॥ अहंकार ऊद्रेग अपारा । श्वासा हीन तत्व छिनधारा ॥ अहंकार युग बीते जबही । त्रेताकी परलै भइ तबही ॥ त्रेता अन्तकाल जब कीन्हों । आधी निशा टंकोरजोदीन्हों ॥ आधी रात नाद घन बाजा । महानिशान मेघ जनु गाजा ॥ त्रेता आदि अन्त व्यवहारा । उपजा द्रवा परकला अपारा ॥ द्वापर युगकी कला अनन्ता । सुखदुखमध्य आदिदुखअन्ता ॥ प्रथम घरी द्वापरकी आई । अर्थनाम युग महा समाई ॥ अर्थनाम युग द्वापर माहां । अर्थ अहर्निश व्यापै ताहां ॥ अर्थनाम युग घरी समाना । घरिकै बीते युग क्षय माना ॥ एक युग बीते दूसर आवा । धर्मनाम युग तहीं धरावा ॥ धर्मयुग धरनी धरु साँचा । श्वासा छहसै सतरी पाँचा ॥ धर्मधार औ धीर तुरझा । धर्मयुग रोग वियोग सुरझा ॥ धर्मनाम युग बीते जबही । गहर काल युग बरतैं तबही ॥ गहरकाल युग कहर कमाई । रविरथ बीच ध्वजा फहराई ॥