भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1677

शवासुखज्जार

( ६७ )

कूर्म स्नेह लक्ष कर जोरा । चतुर सनेह ज्ञानबल जोरा ॥ पग छतनार होइ जेह जानी । पुस्तपांव पर काल कुबानी ॥

समय-चरण पलौ सम होय कर, घटिका पलो प्रमान ।

ज्ञान सनेही दूत है, रोम रोम भगवान ॥

चौपाई

दूनों अंग विचारेहु जानी । एकरज भक्ति एक विष खानी ॥ दोऊ अंग लक्षण गहो शरीरा । पाछे देहु मुक्ति बरबीरा ॥ परिचय भेद विचारहु जानी । पान लेत जिव होय न हानी ॥ लक्षण लक्ष्य होय सम तूला । पावै सतगुरु मुक्तिके मूला ॥

समय-आदि निशानी देखिकै, बांए दहिने बाम ।

शब्द सनेह नेह करि, तब दीनों निजनाम ॥

चौपाई

बांए अङ्ग मसा जो होई । तीरथ अङ्ग रेखा हो दोई ॥ बांए अंग विषयकी बासा । माया सघन वंश कुल ग्रासा ॥ दहिने अंग विषय जो होई । शीस संपति सुख गासै सोई ॥ विकटदंत होय जेहि बारी । शीलवंत सुख प्रेम सुधारी ॥ बिरर चिकुर सुख बुम्ब सनेही । विहसत वदन सदा सुखनेही ॥ उज्ज्वल नेह सदा सुखदाई । शील सनेह भक्ति बहुताई ॥ हंस गमन सतगुरु सों नेहा । मधुरी बोले प्रेम सनेहा ॥ कर पद कोमल शरद शरीरा । सुत संपति जैसे दारुण धीरा ॥ मधुर बात औ चमकै देहा । सबते बोले सुरति सनेहा ॥ सुरतिवंत प्रीतमकी प्यारी । पछो लांव जेठ पुर भारी ॥ श्यामगात लहसन तन माहा । माया संच न औ ग्रासै नाहा ॥ राजवरण प्रिय श्याम शरीरा । पियाहि आहिपरीमल गंभीरा ॥ बगलधि सुख आमिष जो होई । तन प्रसेव सुत सुताहि विगोई ॥