कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1707, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्वासगुञ्जार
( १७ )
चौका चारि सुधारके, चारि कमल अस्थान । चारिउ पौन उरेहिके, देखो सुरति अमान ॥ सुरति सनेही पौन कहैं, सुमिरहु सुरति सुधार । चारिउ अंक सुधारिके, जल दल धरेउ सुधार ॥ प्रथमहि चौका कीजिये, चारि खूँट अनुमान । चौरासी द्रौप सुधारिहै, सत्य लोक सहिदान ॥ ऊपर पँखुरी द्रौपके, भीतर चौका चारि । द्वादशदल निर्वाण है, देखो सुरति बिचारि ॥ माया छत्र विस्तारहु, सती नाम विश्वास । द्वादशदल तहाँ सुरचिके, कीएहु प्रेम प्रकाश ॥ जापर बसे निरक्षर, ताहि तत्त्वको नाम । शब्दसुधारस खानि है, हम तुम तेहिके धाम ॥ शब्द सुरतिको नाम गहि, सुमिरै शब्द सुधार । तब सिंहासन पग धरै, रचै लोक विस्तार ॥
चौपाई
कदली दल आनेहु पनवारा । धरहु नारियर प्रेम सुधारा ॥ सनमुख कलशाले साजेउ जानी । बाती पांच धरेउ तहाँ आनी ॥ आसन लिखेहु लगनको नामा । भर्म्मभूत भाजै तजि धामा ॥ दहिने राखहु दल परवाना । मेटै जहर अभी धरि ध्याना ॥ निर्मल नीरकी देह दुहाई । जहर नीरकी दशा मिटाई ॥ आसन लेई लगनको नामा । लगन सनेह सुधरै धामा ॥ खरचा पांच धरेउ तिहि माहां । प्रकटे सत्य शब्दकी छाहां ॥ बहुबिधि बाससुगन्धमिलायहु । चौकाके दहिने धरवायहु ॥ ताके निकट शिला अस्थाना । रेखा रोपि करेहु बन्धाना ॥ सत्यशब्द ले रखै बनायहु । ताके ऊपर शिला बैठायहु ॥