कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंशवासगुञ्जार
( १०७ )
जहां पीर तहां संशय धीर । संशय मध्य असंशय नीर ॥ जहां नीर तहां सुख संतोषा । जरा मरण नहीं ब्यापै धोखा ॥ जहां धोख तहां आवै धीर । जहां धीर तहां गहिर गम्भीर ॥ जहां गँभीर तहां थिर होई । जहां थिर तहां लहरि न सोई ॥ लहरि नाहिं तहां आपै होई । आपा मेटि होई रहै समोई ॥ ममता मोह लहरि तजि जोई । भाव भक्तिके मानुष गोई ॥ मनसा गहै होय निर्वाना । पावै सत्य सही अस्थाना ॥ नातरु फिरि आवै संसारा ।
संसार आइके भक्ति कमाई । भक्ति कमाइके भक्ति कहाई ॥ भक्ति कहाइके रहै उदासा । सतगुरु मिले सत्य विश्वासा ॥ सतगुरुते दूसरे गुरु नाही । आवा गौन रहित घर जाही ॥ सतगुरु मिलै तो संशय भागे । संशय बहुरि अङ्ग नहीं लागे ॥ सतगुरु सुख संतोषके नायक । परमारथ सो सदा सहायक ॥
समय-साधु बडे परमारथी, घन ज्यों वरवै आय ।
तत बुझावै आनकी, आपनो आपन लाय ॥
जैसे वृक्ष न फल भखै, नदी न अँचवै नीर ।
त्यों परमारथ कारने, संतन धरो शरीर ॥
सन्त सराहिये ताहिको, जाके सतगुरु टेक ।
टेक निबाहै देह भरि, रहै शब्द मिलि एक ॥
सत्यशब्द हितमानिकै, सुमिरि सतगुरु धीर ।
धर्मदास तुव वंशके, एके गुरु कबीर ॥
चौपाई
सत्य सुकृत सुमिरै चित माही । टूटत वज्र राखि लेउ राही ॥
समय-सत्य सुकृतके बाल कह, जो चितवे कर दीठ ।
ताजन लगै चौहटै, गुनहगारके पीठ ॥