कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1724, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( २ )
बोधसागर
मनते तन मात्रा भे पांचों । मन स्वरूप ब्रह्माको वांचों ॥ मन ब्रह्मा ब्रह्मा मन सोई । जस संकल्प करे तस होई ॥ रचे अविद्या शक्ति विधाता । जिहि अनात्ममें आत्मलखात ॥ ब्रह्मा सोइ अविद्या कारण । विद्या राचे ताहि निवारण ॥ उठे तरंग सिंधुमें जैसे । बहुरि समाय ताहि पुनि तैसे ॥ ब्रह्माते इमि जगत प्रकटाई । फेरि लीन तामें है जाई ॥ सत्य शुद्धमें मनको फुरना । सो कारण सब दुःखको जुरना ॥ उपै खपै बिधिते जिव कैसे । अग्निते चिनगारी लखि जैसे ॥ दुःख मूल बासना बिकारा । मनही कर्म रूप निज धारा ॥ मन अरु कर्म एकही आहीं । कमलसुगन्धभेद जिमि नाहीं ॥ मनमें जो संकल्प फुराई । सो अँकूर कर्म कहलाई ॥ कर्म कि पूर्व देह मन अहई । मनमय देह कर्मका गहई ॥ जो कछु सत्य असत्य गहोई । मनको कियो सत्य सब होई ॥
इति
अथ चारवर्णकी उत्पत्तिवर्णन—चौपाई
ब्रह्मा मुख ब्राह्मण प्रकटाये । ब्राह्मणको इमि अर्थ बताये ॥ प्रथम अक्षर पवित्रता थापू । द्वितीये अक्षर तेज प्रतापू ॥ द्वितीये बाहुते क्षत्रिय भयेऊ । अक्षर आदि पराक्रम गहेऊ ॥ द्वितीये अक्षर रक्षा कारी । तृतीये वैश्यको अर्थ उचारी ॥ प्रथम शब्द स पति गह सोई । दूजे अर्थ पालना होई ॥ चौथे चरणते शुद्ध उपाये । ताको ऐसे अर्थ बताये ॥ प्रथम शब्द तुच्छता बताई । द्वितीय दीनता अरु सेवकाई ॥ वेद पाठ षट्कर्म जनेऊ । तीन बरणके हेतु बनेऊ ॥ चहुँके संस्कार क्रम न्यारो । ब्राह्मण वर्णको भेद उचारो ॥ ब्राह्मणमें द्वै भेद है सांचो । पंच गौड अरु द्राविण पांचो ॥