कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
तिहि औसर शिव परम सनेही । वेद धर्म थापै करि देही ॥ जैसो आगम व्यास बखाने । जैन बुद्ध मत महि अधिकाने ॥ वेद धर्म तब भयो मलीना । बिरला कोई आदर दीना ॥ बिकमादितके समयमें कहेऊ । शंकर शंकराचार्य भैऊ ॥ दक्षिण देश द्विजकुल औतारा । वेद धर्मको पालन हारा ॥ चहुँदिश जाय विजय दिग कीना । कथि निजज्ञान नीति जगलीना ॥ वेद धर्म मरयाद धराया । बाढ़ी सन्मुख तासु पराया ॥ स्मृती धर्म कीन परचारा । धर्म स्मार्त नामसो धारा ॥ जैन बोधको जीत्यौ सोई । राजा शंकरकी वश होई ॥ तिहि औसर भूपाल छुभाया । केते जैनी सरित डुबाया ॥ मंडन मिश्र ब्रह्मा औतारा । धर्म मिमांसा जग विस्तारा ॥ शंकर जब तापर जय पाई । ताकी नारि ताहि ससुहार्ई ॥ मंडन मिश्र गये जब हारी । कामशास्त्र कथ ताकी नारी ॥ शंकराचार्य बाल ब्रह्मचारी । काम शास्त्र विद्या नहि धारी ॥ तिहि औसर अस कारण भयऊ । नृप अमरूक देह तजि गैऊ ॥ योगके बलते शंकराचार्य । नृपतन प्रवेश कियौ निजुकार्य ॥ काम कला सीखे षट् मासा । नृपतनमें कर भोग विलासा ॥ काम शास्त्रको ग्रन्थ बनाई । सो अमरूकशतक कहलाई ॥ नृप तन तजि मंडन पहुँ आये । तासु नारि पर तब जय पाये ॥ मंडनमिश्र भे शंकर चेला । ताको धर्म गह्यौ तिहि बेला ॥
इति
अथ पूर्व आचार्यनके नाम-चौपाई
जहां तो आदि संप्रदा चाली । पीढी पीढी कथौ निराली ॥ प्रथम विष्णु दूजे शिव होई । पुनि तृतीय वसिष्ठ मुनि जोई ॥