कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअवुरागसागर
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भोजन करत साथ खजुआई । बाँह जाँघ पुनि मींजत भाई॥ भोजन करत सोय पुनि जाई । जो जगाय तिहि मारन धाई॥ आंख लाल होहि पुनि जाकी । कहैलंग भेद कहों मैं ताकी॥
छन्द
अचलखानीभेद धर्मनि, छिनक बुद्धि सो होयहो ॥ छिन माहिं करके मेट डारे, कहों तुमसों सोयहो॥ मिले सतगुरु सत्य जा कहैं, खान बुधिसबमेटही॥ गुरुचरणलीन अधीन होवै, लोकसोहैंसापैठही॥३६॥
पिंडज खानिसे मनुष्य गरीरमें आयै हुए जीवनकी पारख
सोरठा-सुनहु हो धरमदास, पिंडज लक्षणगुणकहो॥ कहों तुम्हारे पास चौथीखानिकी युक्तिसो ॥३७॥ पिंडज खानिके लच्छ सुनाऊँ । गुण अवगुणका भेद बताऊँ ॥ वैरागी उनमुनि मत धारी । करे धर्म पुनि वेद विचारी ॥ तीरथ औ पुनि योग समाधी । गुरुके चरणचित्तभलबाँधी ॥ वेद पुराण कथे बहु ज्ञाना । सभा बैठि बातें भल ठाना ॥ राजयोग कामिनी सुख माने । मनशंका कबहुँ नहिं आने ॥ धन संपति सुख बहुत सहायी । सेज सुपेद पलंग बिछायी ॥ उत्तम भोजन बहुत सुहायी । लौंग सुपारी बीसों खायी ॥ खरचे दाम पुन्य महाँ सोई । हिरदे सुधि ताकर पुनि होई॥ चच्छु तेज जाकर पुनि जानी । पराक्रम देही बल ठानी ॥ देखो स्वर्ग सदा तेहि हाथा । देखे प्रतिमा नावे माथा ॥
छन्द
बहुतलीन आधीन धर्मनि, ताहि जितकहैंजानिहो॥ सतगुरुचरणनिशिदिनगहे, मतशब्दनिश्चयमानिहो॥