कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1808, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( २ )
बोधसागर
घाटी नाकहि आगे तब जाई । सकल दूत रहे पछताई ॥ आगे मकरतार है डोरी । जहाँ यम रहे मुख मोरी ॥
ओहं सोहं नामके, आगे करै पयान ।
अजर लोक बासा करे, जगमग दीप स्थान ॥
मुख सागर स्नान करी, होय हंसका रूप ।
जाय पुरुष दर्शन करै जिस दिन परम आनन्द ॥
आदि गायत्री सुमिरिके, आवागमन नसाय ।
सत्य लोक बासा करे, कहैं कबीर समझाय ॥
सुमिरन प्रभात गायत्री
आदिगायत्री अम्बर अस्थान । सोहंतत्त्व ले हंसालोक समान ॥
सत गायत्री अजपा जाप । कहैं कबीर अमर घर बास ॥
सत्य है अमर सत्य है शून्य । सत्यहिमें कछु पाप न पुण्य ॥
कहैं कबीर सुनो धर्मदास । यह गायत्री करो प्रकाश ॥
सुमिरण मध्याह्न गायत्री
अचित्त पुरुष हिरम्ब छाया । नाद बिन्द होय कर्ता आया ॥
यमसो जीता लोक पढाया । सुरति स्नेही हंस कहाया ॥
अचिन्त पुरुषी गायत्री, दीन्ह कबीर बताय ।
निशिदिन सुमिरण जो करै, करम भरम मिटि जाय ॥
सुमिरण सन्ध्या गायत्री
बारह जोजन कोट, यन्त्र जहैं पल्ले छूटे ।
यहि विधि सन्ध्या जपे, भर्मको आगम टूटे ॥
गायत्री ब्रह्मा जपे, जपे देव मदेश ।
गायत्री गोविन्द पढे, सतगुरुके उपदेश ॥
ताको काल न खाय, जो संज्ञा चीन्हे ।
घटमें रही अलोप, काठि हम बाहर कीन्हे ॥