कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1831, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंसुमिरनबोध
( २५ )
चौका पोतके चन्दन चढावा । सत्य सुकृत जिनलोक पठावा ॥ कहैं कबीर सुनो धर्मदास । हँसा गये पुरुषके पास ॥
चन्दन चौका पोतनेका
सिन्धु नीर घट अमी मँगावा । सत्यसुकृतको शीश नवावा ॥ सोहैं पवन लै कीन्ह पसारा । निकुत नाम लै हंस उबारा ॥ तन मन दैके चीन्ह शरीर । अंकनाम कहि दीन्ह कबीर ॥
स्मरण कनिक चौका पोतनेका
कनक छानके निर्मल कीन्हौँ । सहज नाम ह्दे चित दीन्हौँ ॥ चौका पूरे युक्ति बनाई । सतगुरु दीन्हौ भेद लखाई ॥ कहैं कबीर चौका है सारा । चौका बैठो सिरजन हारा ॥
स्मरण मानिक बनावनेका
अग्र आरती कर मन जाना । कीन पवनसो निकसे पाना ॥ शब्द अन्त है ताकर सार । सो जीवनका करै उबार ॥ उबारे हंस करै लोक निवास । बाहर तत्त्वजाने अंशवंश हमार ॥ सत्यनाम मगन जेहि भीतर । कहैं कबीर हम प्रगट शरीर ॥
स्मरण थारमें परवाना धरनेका
थार परवाना कर सम तूला । आदि नाम भाषो मुख मूला ॥ मानिक सवार थारमें धरो । परवाना को सुमिरण करो ॥ कहैं कबीर सत्य है सार । अंश वंश हंस उतारे पार ॥
स्मरण मानिक धरनेका
स्थिरहि थारमें मानिक धरो । एकनाम सुस्थिर दृढ गहो ॥ कहैं कबीर गहो नाम आधार । निश्चल हंस साधि कडिहार ॥
स्मरण कपूर घृत परसेको
अग्र कपूर अग्र घृत धाइ । सो कदली है वाहा नेह ॥ शब्द कपूर तहाँ लै धरो । सतगुरु दयासों निर्भय रहो ॥ कहैं कबीर सुनो धर्मदास । अग्र वासमें करी निवास ॥
नं. १० बोधसागर - १०