भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1848

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बोधसागर

साखी-पंचकोशमत प्रकट जग, वेद कहे सत सोइ । परख बुद्धि निज दृष्टि बल, गुरु कृपा करे जब होइ ॥ द्वैताद्वैत का करे विचारा । शुद्धाद्वैतका करे उपचारा ॥ विशिष्टाद्वैत भली बिधि जाने । पूछत पूछत सबै मन मानै ॥ कर्मोपासना करै विचारा । ज्ञान विज्ञानका पावे सारा ॥ अर्थ धर्म मोक्ष रू कामा । सबका पूछे असली धामा ॥ नवधा भक्तिको रूप पिछाने । योगक्रियाको भली बिधि जाने ॥ राजयोग हठयोग स्वरूपा । सबही आसन सिद्धि अनूपा ॥ ब्रह्म जीव अरु प्रकृतिका भेदा । द्वैतज्ञानका करे अच्छेदा ॥ नाना मत जग आहि जो भाई । सबका भेद जो गुरुसे पाई ॥ आस्तिकनास्तिक मन अनुहारा । सबही फंदा करे विचारा ॥ पूछि गुरुसे सबही सुधारै । गुरुके पारख काल फन्द टारै ॥

साखी-संसाररी पारख बिना, कैसे पावे ठौर । विध युक्ति अनमिल सबै, भोग वहीँ औरके और ॥ कालजालकी विकट है चाला । जीव विकल तेहिमध्ये विहाला ॥ पारख यथारथ प्रभु प्रकाशू । कठिन महात्म काल विनाशू ॥ काल चक्र चक्की कठिनाई । पारख पाये जात बिलाई ॥ पारख बल बहियाँ भौजेही । सबहीविधि चीन्ह पडाखलतेही ॥ गुरु प्रसाद पारख हठ पाये । विकट कला यम जालछुडाये ॥ एक एक पारखे जेहि फाँसा । सो संक्षेप करे प्रकाशा ॥ जाते जीव बचे यमफाँसा । शरणागत हठ परख विलासा ॥ भक्तिभाव प्रेमहि अधिकाई । परख लहत बल काल नशाई ॥ कालकला नहि पावे ताको । भक्ति भाव गुरु पारख जाको ॥ परम पारखी जीवन मुकता । नहि पावे तेही कालक उकता ॥ साखी-बिनु शरणागति परख गुरु, नहि जीवन निस्तार । सरवोपरि गुरु परख हैं, लहै तो होय उबार ॥