भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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सुमिरनबोध

( ४७ )

अथ गुरु उपदेशमहिमायोग प्रारम्भः

दोहा—गुरु संत वन्दन कहूं, ऐहै सुखको पूर ।

गुरुमाहिमा बरनन कहूं, शिर धरि पदरजधूर ॥

सन्त सबै शिर ऊपरे, निस्पृही निज नाम ।

सबके मस्तक मुक्ति गुरु, पूरवे मनके काम ॥

चौपाई

परब्रह्मको आदि मनाऊँ । तिनकी कृपा गुरुचरनन पाऊँ ॥

गुरु सोई सब सिरजन हारा । गुरुकी कृपा होय भवपारा ॥

गुरु बिन होम यज्ञ नहीं कीजे । गुरुकी आज्ञा माहि रहीजे ॥

गुरु संतनके चरण मनायो । ताते बुद्धि उत्तम मैं पायो ॥

सब इष्टनमें सतगुरु सारा । सो सुमिरावे पुरुष हमारा ॥

शरण होय शिष आवै कोई । सहज पदारथ पावै सोई ॥

गुरु सुरतरु सुरधेनु समाना । आवै चरण मुक्ति परवाना ॥

मन बाँधित फल पावै सोई । प्रीति सहित जो सुमिरे कोई ॥

तन मन धन आर्पि गुरु सेवै । होय गलतान उपदेशहि लेवै ॥

गुरु बिन पदारथ और नजानै । आज्ञा मेटि और नहीं मानै ॥

सतगुरुकी गति हिरदय धारै । और सकल बकवाद निवारै ॥

गुरुके सन्मुख बचन न कहै । सो शिष रहनिगहनि मुखलहै ॥

गुरुसे बैर करै शिष जोई । भजन नाश अरु बहुत विगोई ॥

पीढ़ि सहित नरकमें परिहै । गुरु आज्ञा शिषलोपन करिहै ॥

चेलो अथवा उपासक होई । गुरु सन्मुख ले झूठ संजोई ॥

निश्चय नरक परै शिष सोई । वेद पुराण भनत सब कोई ॥

सनमुख गुरुकी आज्ञा धारै । अरु पाछे तैं सकल निवारै ॥

सो शिष घोर नरकमें परिहै । रुधिर राध पीवै नहीं तरिहै ॥

मुखपर बचन करै परमाना । घर पर जाय करै विज्ञाना ॥