कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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कबीर चरित्रबोध
( १८०९ )
कह, उस समयसे मैं राम राम कहने लगा । तब स्वामीजीने कहा कि हाँ एक बालक तो था जिसको मेरे खड़ाऊँकी ठोकर लगी और उससे मैंने रामराम कहनेको कहा था । कबीर साहबने कहा कि, गुरुजी वह लड़का मैं ही था । स्वामीजीने कहा कि, क्या इस प्रकार कोई गुरु चेला हो सकता है ? तब कबीर साहबने कहा कि, गुरुजी वेदशास्त्रमें रामनामसे बढ़कर और दूसरा क्या है ? तब स्वामीने उत्तर दिया कि, सबसे बढ़कर यही है, उससे बढ़कर और कुछ नहीं है । फिर साहबने कहा कि, जो नाम सबसे बढ़कर है सो तो आपने मेरे माथेपर हाथ धरकर दे ही दिया-फिर गुरु और शिष्य किस प्रकार होता है ? फिर स्वामीजी बोले कि, जिस बालकसे मैंने राम नाम कहा था वह छोटा था और तू बड़ा जान पड़ता है । तब कबीर साहब वैसाही छोटा बालक बनकर स्वामीकी गुफाके भीतर देख पड़े और गुरुजीके चरणोंपर गिरकर कहने लगे कि, मैं उस समय ऐसाही छोटा था न ? यह कौतुक देखकर लोगोंको अत्यन्त आश्चर्य हुआ कि, देखो यह बालक कैसा छोटा हो गया । उस समय स्वामीजीने कबीर साहब को गले लगा लिया, उसी समयसे कबीर साहब स्वामीजीके शिष्योंके साथ रहने लगे और स्वामीजीके जितने शिष्य थे सब कबीर साहबको अपना गुरु करके मानते और अत्यन्त मर्यादा तथा प्रतिष्ठा किया करते थे और स्वयम् कबीर साहब सबसे नितान्तही नम्रतापूर्वक मिलते थे । यहाँ तक कि रामानन्द स्वामीके चौदहसौ चौरासी शिष्योंमें कबीर साहब सबके सरदार हो गये थे ।