भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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कबीर चरित्रबोध

( १८२७ )

ओंकी भीड़ कबीर साहबकी पर्णकुटीको घेरे खड़ी है किन्तु कबीर साहबका पता नहीं है । कबीर साहबके न मिलनेसे भेषमें कोलाहल होने लगा । जिनके मनमें जो आया वही बकने लगा । यह हाल देखकर विद्वेषियोंकी बन आयी, सब अपने मनही मन अपनी सफलता जान प्रसन्न होने लगे । इतनेमें रसद बाटनेके समय नौ लाख बोरि खानेकी वस्तुओंके भरकर केशव नाम वनिजारा आया और भण्डारा आरंभ हो गया । सब साधुओंकी सेवा तथा पढ़ुनाई आरंभ हो गयी । किसीको यह जान न पड़ा कि, ये कौन लोग हैं तथा कहाँसे आये हैं जो भण्डारा कर रहे हैं । पन्द्रह दिन पर्यंत बराबर भण्डारा होता रहा, इसके उपरान्त समस्त सन्त महन्तको भेंट तथा वस्त्रादि देकर केशवने विदा किया और सब धन्य कबीर धन्य कबीर और जय जय कबीर कहते हुए विदा हुए और विद्वेषी ब्राह्मण सब सँह पसारकर रह गये, कुछ न बना ।

लक्ष्मीजीका कबीर साहबको लुभाने आना

विष्णुने लक्ष्मीजीसे कहा कि तीनों लोकमें तो ऐसा कोई नहीं है जो तुम्हारे नयनबाणद्वारा आहत न हुआ हो और तुम्हारी मोहिनी मूर्ति और तुम्हारी कटाक्षद्वारा आत्म विस्मृति न कर गया हो, पर जब कबीर साहबपर अपना जादू डालोगी तब मैं तुम्हारे मन-मोहन मंत्रकी प्रशंसा करूँगा, तुम काशीजीको जाओ और कबीर साहबको लुभाओ, तब लक्ष्मीजी रूप बदलकर काशीमें कबीर साहबके पास अत्यंत हावभावके साथ आयीं और कबीर साहबके सामने खड़ी होकर कहने लगीं कि, ऐ महाराज ! आप मुझको अपने घरमें रखो, मैं आपके साथ निवास किया चाहती हूँ । तब कबीर साहबने उसकी ओर दृष्टिपात भी नहीं किया