भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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कबीर चरित्रबोध

( १८५५ )

यथा

पण्डित सतपद भाजो रे भाई । जाते आवागमन नशाई ॥ ज्ञान न उपजा ब्रह्म नहीं चीना आप कहाँते आए । एक योनिसे चार बरन भए ब्रह्मदेह कहा पाए ॥ बारह वेदी ब्रह्म बखान् स्वर औ शक्ति समानी । संध्या तर्पन तहां करलीना जहां कुशा नहीं पानी ॥ ऋग यजुरज्ञानको बुद्धी साम अर्थवेन सोई । सूक्ष्म वेदको भेद न जाने कयोंकर ब्रह्मन होई ॥ शूद्र शरीर ब्रह्म तेहि भीतर भिन्न भेद कछु नाहीं । लखचौरासी जिया जन्तुमें बरत रहो सब ठाई ॥ नौगुण सूतसंयोग बखान् तिरगुण गाँठ दयानी । तासु जनेउ कबहुँ ना टूटे दिन दिन बारह वानी ॥ कहैं कबीर गुरुब्रह्म चीन्हले जगत जनेऊ सोई । पाखण्डकी गति सबही मिटावे तब निज ब्राह्मण होई ॥

यथा

हिरवा गँवाए सास चली वारी धनियां ।

कौन सौतिन है कौन सुमन है कौन वेद तुम जानियां ॥ कौन पुरुषको ध्यान धरत हो कौन है नाम निशानियां ॥ एही तनु ओंकार सुमन है सूक्ष्म वेद हम जानियां ॥ सत्य पुरुष तो ध्यान धरत हैं सत्य है नाम निशानियां ॥ यह मत जानो हिरवा जरवा बनियां दूकान बेगानिया ॥ अलख मूलक हिरवा मोरा अगम देशते अनियां ॥ एक है चोर सकल जगमोंसे राजा रैयत रनियां ॥ कहैं कबीर सुनो भाई साधो अलख है नाम निशानियां ॥