भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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कबीर चरित्रबोध

( १८६३ )

उनको दक्षिण ओरकी गुरुवाई प्रदान की गयी और सत्ताईस वंश हैं । तीसरे गुरुराज बंकजी हैं । उनको पूर्व ओरकी गुरुवाई प्रदानकी गयी और उनके सोलह वंश हैं । चौथे गुरु सहतीजी हैं और उनके सात वंश हैं और उनको पश्चिम ओरकी गुरुवाई प्रदान की गयी । ये चारों गुरु चार ओर ठहराये गये हैं और जब ये चारों गुरु चारों ओरसे सत्यनामका डंका बजावेंगे तब कबीर साहबका धर्म भलीभाँति पृथ्वीपर प्रचलित होगा । इन चारों गुरुओंमें केवल धर्मदासजी अबलों प्रकट हुए और उनकी वंशगद्दी स्थिर हुई । और पूर्वोक्त लिखित तीनों गुरु अबलों प्रकट नहीं हुए जब वे भी प्रकट हो जावेंगे तब इस धर्मका प्रचार विशेष होगा । अब तो केवल धर्मदासजीके वंश बयालीसका विवरण करता हूँ ।

धर्मदासके बयालीस वंशका वृत्तांत

धर्मदासके बयालीस वंशका यह ठीका सत्यगुरुने ठहराया है कि प्रत्येक वंश पच्चीस वर्ष और बीस दिवसों पर्यंत गद्दीपर बैठा करे और इससे अधिक तथा न्यून कोई न रहे । और सत्यगुरुकी आज्ञानुसार उनका अवतार और उनका अधिकार होता आता है । फिर वे अपनी इच्छासे शरीर छोड़ कर सत्यलोकको सिधारते हैं । जिस दिवस साहबका चलना होता है उसके पूर्व अनेक सन्त महन्त दर्शनार्थ एकत्रित होते हैं और जिस दिवस पच्चीस वर्ष तथा बीस दिवस पूरा होता है उस दिवस जो गद्दीका अधिकारी होता है उसको अपने स्थान गद्दीपर बैठा देते हैं और समस्त कार्य सौंप देते हैं । जब सब कार्य ठीक हो चुकता है उस समय आय पानका बीड़ा लेते हैं इसको चलानेका बीड़ा कहते हैं । जब वह चलाने-

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