भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 2001, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2001

१५

जीवधर्मबोध

( १९२३ )

चौपाई

कोई है पती पयोधर पकरे । कोई बनि पुत्र ताहिंते टकरे ॥ भरता पुत्र होय नहिं दोऊ । सत्य कबीरते और न कोऊ ॥ नारिके बसमें सब संसारी । रचना तिहु पुरमाह पसारी ॥ भवसागर भगसागर जानी । भवके करता भव रु भवानी ॥ तीनों पुरको ईश कहाया । जिन भगचौरके राह बनाया ॥ भगके रुधिरते भगवा भेषा । देव निरंजन अकथ अलेपा ॥ उज्ज्वल भेष पुरुषको बाना । भगवा भेष निरंजन राना ॥ अंग पिंड भग माह समाना । सत्य कबीर बचन परमाना ॥ अंतर ज्योति शब्द यक नारी । हरि ब्रह्मा ताके त्रिपुरारी ॥ ताहि तियहि भग लिंग अनंता । तेउ न जाने आदिवो अंता ॥ लिंग रूप यक शंकर कीना । धरती खिला रसातल दीना ॥ भा बालक भग द्वारे आया । भग भोगनको पुरुष कहाया ॥ अबला सम कहुँ बली न कोई । तीन लोक ताकी बस होई ॥ अष्ट प्रकारके मैथुन अहई । ताते न्यारा कोह न रहई ॥

दोहा-श्रौतो सुमिरन कीर्तनो, चितवन बात यकंत ।

हठसंकल्पो रत्न पुनि, प्रापति अष्ट कहंत ॥

चौपाई

मिथुन विकार जीव सब पागा । जरे तीन पुर तिय अनुरागा ॥ जेती जगमें कथा किहानी । नारिप्रताप सकल से जानी ॥ जबलों रहैं देहको खेला । तबलों हो नारी सँग मेला ॥ नारि परे जो जाना चहई । ताकी देह तहां नहि रहई ॥ भग भोगै अरु भक्त कहावै । फिर फिर भगभोगनको आवै ॥ जड़ चेतन दोउ नारि स्वरूपा । कनक कामिनी जिव भ्रमरूपा ॥ विषकी बेल दोहूको जानी । लगे ताहिमें जिव अज्ञानी ॥